शनिवार, 19 दिसंबर 2009

क्या राहुल नाटक करते है ?


अपनी माँ सूर्पनका सोनिया गाँधी की तरह उसका बेटा भी जनता को मुर्ख बना रहा है...

देखिये किस तरह ये झूठा आदमी अपने आप को आप आदमी की तरह दिखाकर जनता को मुर्ख बना रहा है...उसके हाथों में एक खाली प्लास्टिक का छोटा सा टब है...पैरों में रिबूक के जूतें हैं..जबकि उसके आगे चल रही एक मजदूर औरत नंगे पैर है और उसके हाथों में असली भोझा है...ये आदमी (राहुल) नशे की लत से ग्रसित है (क्योकि आखें कभी झूठ नहीं बोलती) एक बार इसे FBI Boston ने दृग्स रखने और गैरकानूनी ढंग से पैसा रखने के आरोप में गिरफ्तार भी कर लिया था. वो तो अटल बिहारी वाजपेई जी प्रधानमंत्री थे, जिनके ऑफिस ने तुरंत अमेरिका में संपर्क करके राहुल को छुडवाया.

अब ये आदमी कहता है की उसकी पार्टी गरीबों के साथ है..याद रखिये इसी पार्टी के कारण ही भारत में आज इतनी गरीबी है...ये नेहरु की सेकुलर निति का ही परिणाम है...

Today, billions of dollars from India are stashed in Swiss Bank — thanks largely to the Congress misrule. The Congress is responsible for keeping India in poverty, pro-poor indeed.

Besides, the Congress is fully into Muslim appeasement. The spineless Prime Minister that is Manmohan Singh has declared funds for terrorist families. Besides, he is also on record stating that the first right on the resources of the nation belongs to Muslims.

Voters, beware of the Congress-Manmohan-Sonia nexus. They will Talibanise India with their pussyfooting. Elect a pro-Hindu Government at the Center.

The Indian Media is hardselling Rahul while condemning Varun. Both are as differen as chalk and cheese. Choose patriotic Varun over these Islamic bootlickers.

*** On the education of Rahul Gandhi ***

Rahul Gandhi's post-school education is as follows:

St Stephens - one year, 1989-90
Harvard University - one year, 1990-91

The admission at St Stephens was not on the basis of merit, but on the sports quota. And the sports speciality - rifle shooting. So, one wonders the merit basis about admission to Harvard University.

His job in London? One says that he worked for a computer firm. Another says that he was an investment banker. Give the above education, one has to ask questions about competence in either. Of course, education alone is not a sufficient criteria, but it would be considered to be a necessary criteria. There are many who have not completed education, but have made a name for themselves in their chosen field. But this is something that cannot be said of Rahul Gandhi.

Do Rahul Gandhi's minders really think that they can get away with what they are trying to project? Another issue that arises is why does the media (Indian and foreign) are projecting Rahul Gandhi was what he is obviously not? And do they not have the necessary mechanism to investigate the education background? Either someone is lying to them or they are being told facts duly stretched. But then why is the media falling for it? Here are some reports on the subject.

Rahul is Mentally Slow /Retarded

People who interacted with Rahul Gandhi know this very well , he is mentally slow ! In contrast to Priyanka's assertiveness, one of her only two competitor's to the Gandhi mantle, her younger brother Rahul displays an awkwardness and the type of submissive behavior, which does not a leader make. In comparison to Priyanka's strong and colorful demeanor, Rahul looks like an insipid hanger on. Much of his lack of self-esteem can be attributed to the explosive secret that Rahul Gandhi is in fact mentally retarded. His mental handicap has been well hidden by the Gandhi family and the unconscionable press.

Rahul was in fact refused permission to some of Delhi's top institutions because of his mental handicap. A frustrated Gandhi family had then pulled strings at Harvard, where a quota of seats is always available for a price to the rich and famous. Since then Rahul was bundled off to the US and later UK much as his father Rajiv Gandhi had been packed off to Cambridge in the hopes that he would somehow muddle through an academic degree.

Rajiv of course never passed a single test at Cambridge and instead of bringing home a degree came back with an equally illiterate Catholic au pair of Italian extraction as his wife। Following in his father's footsteps, Rahul too has come back without a degree to his name, and a fair skinned South American Catholic girlfriend on his arm.
साभार --कट्टर हिन्दू ,फेसबुक

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

नक्सलवाद का सेक्सवाद


नक्सली संगठनों ने सामाजिक राजनीतिक बदलाव की मुहिम छोड़ कर महिलाओं का बर्बर उत्पीड़न शुरू कर दिया है उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड और छतीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में जहाँ इंसान का वास्ता या तो भूख से पड़ता है या फिर बन्दूक से ,नक्सलियों ने यौन उत्पीडन की सारी हदें पार कर दी हैं माओवादी , भोली भाली आदिवासी लड़कियों को बरगलाकर पहले उनका यौन उत्पीडन कर रहे हैं फिर उन्हें जबरन हथियार उठाने को मजबूर किया जा रहा है वहीँ संगठन में शामिल युवतियों का ,पुरुष नक्सलियों द्वारा किये जा रहे अनवरत मानसिक और दैहिक शोषण बेहद खौफनाक परिस्थितियां पैदा कर रहा है वो चाहकर भी न तो इसके खिलाफ आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं इस पूरे मामले का सर्वाधिक शर्मनाक पहलु ये है कि जो भी महिला कैडर इस उत्पीडन से आजिज आकर जैसे तैसे संगठन छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटने की कोशिश करती हैं ,उनके लिए पुलिस बेइन्तहा मुश्किलें पैदा कर दे रही है ।
शांति, बबिता, आरती, चंपा, संगीता...ये वो नाम हैं जिनसे चार -चार राज्यों की पुलिस भी घबराती थी। लेकिन आज पीडब्ल्यूजी एवं एमसीसी की ये सदस्याएं, पुरूष नक्सलियों के दिल दहलाने वाले उत्पीड़न का शिकार हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है वहीँ मुख्य धारा में शामिल होने को लेकर उठी उनकी आवाज लाठियों से बर्बरतापूर्वक कुचल दी जा रही है।
आलम यह कि माओवादियों और पुलिस के बीच की चक्की में पिस रही महिला कैडर न संगठन छोड़ पा रही हैं और न ही अपने गांव वापस लौट पा रही हैं। जो महिलाएं सजा काट कर जेलों से अपने घर लौटी हैं उनका कभी नक्सली तो कभी पुलिस दोहन करती है।माओवादियों के जुल्मोसितम की शिकार सरिता कहती है, अब मरने के अलावा हमारे पास कोई और रास्ता नहीं।’
प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश -बिहा-झारखण्ड सब जोनल कोमेटी में मौजूदा समय में लगभग ७५० महिला नक्सली शामिल हैं और सबकी कहानी लगभग एक जैसी है , नक्सलियों की चहेती कैडर चंपा ने जब यौन उत्पीड़न से आजिज आकर साथ चलने से मना कर दिया तो नक्सलियों ने उस पर हमला बोल दिया।
खूब शौर्य दिखाया। माओ जिंदाबाद के नारे लगाए और चंपा को इतना पीटा कि वह लाश की तरह गिर पड़ी और बहादुर नक्सली उसे मरा समझ कर वहां से चले गए। । बबिता ने गिरफ्तारी के बाद एकजोनल कमांडर से पैदा हुई अपने नवजात बच्चे को जेल के शौचालय में ही मिटटी के घडे में बंद करके मार डाला पिछले एक वर्ष के दौरान रेड कॉरिडोर का मुख्यद्वार कहे जाने वालेइन राज्यों में संगठन में रहते हुए सैकडों की संख्या में महिला नक्सली बिनब्याही माँ बन गयी वहीँ तमाम जेलों में बंद महिला नक्सालियों के भी जेल में ही गर्भवती हो जाने की भीजानकारी मिली है , हालाँकि यह खौफनाक सच्चाई कभी जेल की दीवारों में तो कभी बीहडों में ही दम तोड़ देती है
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की महौली निवासी चंपा [19 वर्ष] कुछ वर्ष पूर्व सहेलियों के उकसावे में नक्सलियों के साथ जंगलों में कूद गई। कुछ ही दिनों में वह एसएलआर चलाने में माहिर हो गई।एम .सी.सी में शामिल होने के तीन वर्ष बाद जब एक दिन पुलिस ने उसकी मां को 15 दिनों तक बंधक बना रखा तो उसे मजबूरन हाजिर होना पड़ा। फिर एक साल की जेल। छूट कर आई तो घर वालों ने पड़ोस के गांव में उसका ब्याह कर दिया।
यह शादी नक्सलियों को रास नहीं आई। उसका दो माह का बेटा गोद में था जब एक रात 150 नक्सलियों ने उसके घर हमला बोल दिया।नक्सली उसे जबरन घर से बाहर निकाल लाये और उसे साथ चलने को कहा। चंपा के इंकार करने पर गांव वालों के सामने ही उस परअनगिनत लाठियां बरस पड़ीं। चंपा बताती है मैं चीखती रही पर कोई बचाने नहीं आया ,लगभग दो घंटे तक उसे बर्बरतापूर्वक पीटने के बाद नक्सली उसे मरा समझ वापस चलेगए। चम्पा आज भी जिंदा है, लेकिन मुर्दे की तरह। डॉक्टर बताते हैं कि चंपा का गर्भाशय क्षतिग्रस्त हो गया है। अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं किया गया तो उसकी जान कभी भी जासकती है। चंपा मजदूरी कर मुश्किल से अपना और अपने बच्चे का पेट पाल रही है, इलाज क्या कराए?घर वालों ने पहले ही बाहर कर दिया अब कोई न आगे ना पीछे ,कहीं से से कोई उम्मीद नहीं
18 वर्ष की सविता अपने आठ माह के बच्चे को गोद में लिए जिन्दगी की दुश्वारियां झेल रही है। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर में पांच साल पहले शामिल सविता का प्यार एक नक्सली से हुआ। एरिया कमांडर ने दोनों की शादी करने का फरमान जारी कर दिया। ब्याह के कुछ ही दिन बीते थे कि अलग-अलग मुठभेड़ में दोनों पुलिस की गिरफ्त में आ गये। सविता को मिर्जापुर और अजय को बिहार के भभुआ जेल में बंद कर दिया।
पिछले साल जेल से छूट कर आई सविता दुधमुंहे बच्चे को लेकर ससुराल पहुंची तो ससुराल वालों ने उसे नक्सली बताकर अपनाने से इंकार कर दिया बहुत सारी कोशिशें करके उसने अपने पति से संपर्क किया तो उसने भी दो टूक जवाब दे दिया ,सविता कहाँ जाये उसे कुछ भी समझ में नहीं आता , अब पहाड़ जैसी अकेली जिन्दगी और पुलिस की रोज की धमकीसविता बताती है 'पुलिस जब नहीं तब हमसे नक्सलियों का सुराग मांगती है ,मैं भला कहाँ से बताऊँ कहाँ है वो सब ?अगर कुछ मालूम होता तो भी शायद नहीं बताती नक्सली मुझे और मेरे बच्चे दोनों को मार डालेंगे
बिहार सीमा के निकट तेलाड़ी की रहने वाली बबिता [18 वर्ष] ने कभी पुलिस की नाक में दम कर रखा था। ओवादी बेहद खुबसूरत बबिता से मुखबिरी के अलावा रंगदारी भी वसूल करते थे बताते हैं कि एक बार जब बबिता ने पार्टी छोड़ने की सोची नक्सली उसे जबरन उठा ले गए और फिर उसके साथ दुष्कर्म भी किया ,उसके बाद जैसे तैसे बबिता पकडी गयी और लगभग डेढ़ साल तक जेल में बंद रही।
अपनी गिरफ्तारी के दौरान इस अविवाहित महिला नक्सली ने जब पिछले वर्ष जेल में ही एक बच्चे को जन्म दिया तो समूचेप्रशासनिक तंत्र में हड़कम्प मच गया। बाद में पट चला कि उसके पेट में पल रहा बच्चा एक कुख्यात नक्सली सरगना कमलेश का था ,जिसे अपनाने से उसने इनकार कर दिया था
कमलेश वहीँ नक्सली है जो पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश के साथ मुठभेड़ में मारा गया था बबिता के साथ जेल में अपने कुछ दिन बिताने वाली समाजसेवी रोमा बताती हैं कि वो एकरात हम नहीं भूलते जब दर्द से बबिता ने अपने आंसुओं से अपनी प्रसव -पीडा को मात दे दी थी ,सबेरे जब हमने और हमारे साथ कि महिला कैदियों ने घडे में बंद मृत बचे को देखातो हम अवाक रह गए ,जैसे तैसे बात खुली ,बबिता ने कैसे बिना किसी कि मदद के वो बच्चा जना होगा ,जब हम ये सोचते हैं तो आज भी हमारी रूह काँप जाती है ,शायद माओवादियों द्वारा दी गयी यंत्रणा ने उसे अन्दर से मजबूत कर दिया था छत्तीसगढ़ के थाना प्रतापपुर की रहने वाली लीलावती पी ,डबल्यू ,जी की एक शानदार शार्प शूटर तो थी ही ,उसे आदिवासियों के करमा नृत्य में भी महारत हासिल थी ,मगर अफ़सोस उसकी आँखें एक गैर नक्सली से चार हुई ,उसका चोरी छिपे प्रेमी से मिलना पुरुष नक्सलियों को नहीं भाया और एक रात उन्होंने उसके प्रेमी विश्वम्भर की हत्या कर दीप्रेमी की हत्या के बाद संगठन छोड़कर दर दर भटक रही लीलावती बताती है कि 'पार्टी में महिलाओं स्थिति सबसे खराब होती है ,पुरुष नक्सली हमें सिर्फ सेक्स की वस्तु समझते हैंबिना कोई शिकवा शिकायत किये सब कुछ सहना और चुप रहना ही महिला नक्सलियों की नियति बन जाती है ,शादी करना तो पहले प्रतिबंधित कर दिया था ,लेकिन अब वोकहते हैं कि संगठन के लोगों से शादी की जा सकती है , जब कोई भी सदस्य किसी गैर नक्सली से ब्याह करना चाहता है या फिर उसके उसके प्यार में पड़ता है तो उसे अक्षम्य अपराध माना जाता हैं जिसकी सजा सिर्फ मौत होती है 'लीलावती बताती है इस स्थिति का फायदा उठाकर पुरुष नक्सली महिलाओं का अनवरत यौन शोषण करते हैं
कभीकभार की जाने वाली औपचारिक पूछताछ को छोड़ दिया जाए तो महिला नक्सलियों के मुख्यधारा में वापस लौटने पर उन्हें शासकीय या कानूनी सहायता न के बराबर ही मिलती है.अगर संगठन से उकता कर उन्होंने आत्मसमर्पण कर भी दिया तो भी पुलिस उसे एनकाउंटर में की गयी गिरफ्तारी दिखाकर तमगा हासिल करने में जुट जाती है ऐसे में इन महिलाओं का रिहा होना बेहद कठिन हो जाता है ज्यादातर मामलों में वकील की मदद लेने के लिए आरोपी महिला अपने परिवारवालों पर आश्रित होती है. चूंकि उनमें से अधिकतर इसका खर्चा नहीं उठा सकते इसलिए उनका केस सालों तक घिसटता रहता है.पहले नक्सलियों और फिर समाज की जिल्लत से परेशान महिला कैदी अक्सर अवसाद और दूसरी मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाती हैं. सबसे बुरा तो ये होता है कि एक बार नक्सली होने का दाग लग जाए तो अलग हो जाने के बाद भी जिंदगी भर के लिए उस महिला का सामाजिक जीवन तबाह होकर रह जाता है.
नक्सलियों में पैदा हुई इस अपसंस्कृति के नतीजे भी सामने आ रहे हैं माओ के नाम पर व बंदूकों के दम पर समता पूंजीवाद के खात्मे और साम्यवाद की स्थापना का सपना संजोये नक्सली एड्स समेत तमाम यौन जनित रोगों के शिकार हो रहे हैं ,और महिला नक्सलियों में बाँट रहे हैं छत्तीसगढ़ स्थित अंबिकापुर के एक बड़े फिजीसियन ने नाम न छपने की शर्त पर बताया कि मार्च के महीने में ,मेरे क्लीनिक पर इलाज करने आये ३ नक्सलियों में एच आई वी रिपोर्ट पोजिटिव आई है उक्त चिकित्सक ने बताया कि नक्सली ,बन्दूक की नोक पर मुझे जंगल ले गए थे और मुझे बीमार नक्सलियों का इलाज करने को कहा गया
सूत्र बताते हैं कि विगत ५ वर्षों में नक्सली गुरिल्लाओं में यौन जनित रोग तेजी से बढे हैं इसकी एक बड़ी वजह नक्सालियों द्वारा किया जाने वाला व्यभिचार भी हैं हाल में ही छतीसगढ़ पुलिस के गिरफ्त में आई सोनू गौड ने बताया कि मैंने संगठन में रहते ही अपने एक पुरुष साथी दिलीप से शादी कर ली थी एक इनकाउन्टर में दिलीप मारा गया और उसके बाद मुझे पार्टी के पुरुष सदस्यों द्वारा जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाने को मजबूर किया जाता रहा सोनू बताती है कि 'वो बंदूकों की नोक पर हमसे यौन सम्बन्ध बनाते थे ,कई बार तो हमें पता ही नहीं होता था कि आज की रात हमें किस पुरुष नक्सली के सामने परोसा जाना है जानकारी ये भी मिली है कि अनवरत हो रहे इस यौन उत्पीडन से आजिज आकर तमाम महिला गुरिल्ला खुद को पुलिस के सुपुर्द कर दे रही हैं ,वहीँ अपनी पहचान छुपाकर भाग खड़ी हो रही हैं ,इन सबके बीच माओवाद का ये चेहरा और भी सुर्ख होता जा रहा है

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

प्रदूषण से दम तोड़ रहा रिहंद.


प्रदूषण के अथाह ढेर पर बैठा रिहंद समूचे उत्तर भारत में अभूतपूर्व उर्जा संकट की वजह बन सकता है लगभग 15,000 मेगावाट के बिजलीघरों के लिए प्राणवायु कहे जाने वाले रिहंद बाँध की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि आने वाले दिनों में रिहंद के पानी पर निर्भर बिजलीघरों से उत्पादन ठप्प हो सकता है आज रिहंद बाँध यानि कि पंडित गोविन्द वल्लभपंत सागर जलाशय का स्तर 848.7फिट रिकॉर्ड किया गया जो पिछले वर्ष की तुलना में6.7 फिट कम और वास्तविक न्यूनतम जलस्तर से मात्र 18.7 फिट अधिक है
अगली बरसात तक निर्बाध उत्पादन के लिए न्यूनतम जलस्तर को बनाये रखने के लिए जरुरी है कि बाँध के जल को संरक्षित रखा जाए ताकि अनपरा,शक्तिनगर ,ओबरा,विन्ध्यनगर,बीजपुर और रेनुसागर समेत एन.टी.पी,सी और राज्य विद्युत् गृहों को पानी मिल सके ,लेकिन उत्तर प्रदेश में जारी गंभीर बिजली संकट और उससे जुडी जल विद्युत् इकाइयों को चलने की मज़बूरी ,रिहंद के जल को कितने दिनों तक सुरक्षित रख पायेगी कहना कठिन है गौरतलब है कि न्यूनतम जलस्तर के नीचे जाने पर बिजलीघरों की कूलिंग प्रणाली हांफने लगती है ,अवर्षण की निरंतर मार झेल रहे रिहंद की वजह से पिछले पांच वर्षों से ग्रीष्मकाल में ताप विद्युत् इकाइयों को चलाने में दिक्कतें आ रही थी ,लेकिन इस वर्ष का खतरा ज्यादा है
हैरानी ये होती है कि केंद्र और प्रदेश की हुकूमतें उर्जा समस्या और ख़ास तौर से रिहंद के के प्रति संवेदनशील नहीं हैं ,जबकि संकट की गंभीरता बढती जा रही है आज रिहंद की मौजूदा स्थिति प्रदूषण की वजह से है रिहंद बाँध अपना 120 साल की उम्र 60 साल में ही पूरा कर चुका है ,बाँध की तली में जमे कचड़े के अपार ढेर की वजह से ही उसके न्यूनतम जलस्तर को 820 से घटाकर 830 फिर करना पड़ा वहीँ उसकी जलग्रहण के अधिकतम स्तर को 882 से घटाकर 870 फिट कर दिया गया
रिहंद बाँध की निगरानी में लगी स्ट्रक्चर बीहैवियर मोनिटरिंग कमेटी समेत तमाम एजेंसियां मौजूदा स्थिति के लिए बाँध के मौजूदा प्रदूषण को ही जिम्मेदार मानती है अभी कुछ दिनों पूर्व जब रिहंद के जल को पीने से लगभग दो दर्जन लोगों की मौत हुई तो स्वास्थ्य विभाग ने जलाशय के जल को विषाक्त घोषित कर दिया जांच में पाया गया कि 1080 वर्गमील में फैला अमृतमय जल अब मानव और मवेशियों ,जलचर नभचर के लिए उपयोगी नहीं रह गया ,रिहंद बाँध के विषाक्त जल का भयंकर प्रभाव इस इलाके की पारिस्थितकी पर भी पड़ रहा है विषैले जल से पूरे इलाके का भूगर्भ जल भी विषाक्त होने का खतरा है
रिहंद सागर का पानी ओबरा बाँध की विशाल झील में जाता है ,यहाँ से यह पानी ओबरा बिजलीघर की राख, जले हुए तेल ,खदानों और क्रशरों का उत्सर्जन लेकर रेणुका और सोन नदी दोनों को विषैला बनता है ,इस प्रदूषित पानी ने रिहंद ओबरा की सुनहरी नीली काया को स्याह कर डाला है ,जमीन का पानी तो विषैला था ही पिछले कुछ वर्षों से तेज़ाब की वर्षा भी हो रही है इलेक्ट्रो -दी-फ्रांस के अन्वेषी दल ,केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ,वनवासी सेवा आश्रम ,विचार मंच तथा अन्य संस्थाओं द्वारा किये गए अध्ययन की रिपोर्ट कहती है कि उर्जा की कामधेनु रिहंद बाँध का पानी विषाक्त हो चुका है ,बिजलीघरों की शुद्धिकरण प्रणाली अविश्वश्नीय है ,राख बाँध विफल है जिन बिजलीघरों ने इस बाँध को दूषित किया वही अब इसके कोप का शिकार हो रहे हैं
रिहंद बाँध के सम्बंध में एक तथ्य ये है कि इसका आकार कटोरे कि तरह है ऐसे में इसके जलस्तर में बढ़ोत्तरी की अपेक्षा ,जलस्तर के घटने कीदर ज्यादा तेज होती है ,मौजूदा समय में बाँध से जल के वाष्पीकरण की दर लगभग .05 फीट प्रतिदिन है जबकि अप्रैल मई तक यह दर .01 फीट प्रतिदिन तक हो जाती है ,विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तात्कालिक तौर पर बाँध के जलस्तर को विशेष निगरानी में नहीं रखा गया ,और ओबरा एवं रिहंद जल विद्युत् गृहों से उत्पादन को सीमित नहीं किया गया ,तो आने वाले दिन समूचे उत्तर भारत के साथ - साथ नेशनल ग्रिड के लिए अभूतपूर्व संकट की वजह बन सकते हैं
स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करते हुए सिंचाई विभाग के अभियंता कहते हैं 'हम विवश हैं बाँध में जमे कचड़े की वजह से एक निश्चित लेवल तक ही ताप विद्युत् संयंत्रों को कुलिंग वाटर की सप्लाई दी जा सकती है ,ऊँचाई में स्थित विद्युतगृहों में तो अब चेतावनी बिंदु से पूर्व ही कचड़ा जाने लगता है ,हम प्रकृति और प्रदूषण के सामने कुछ नहीं कर सकते '
रिहंद में पानी का अर्थ है देश की बिजली ,भारत की सबसे सस्ती बिजली लेकिन ये भरता नहीं जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे तब शक्तिनगर में केंद्रीय उर्जा मंत्री बसंत साठे ने इस इलाके को 'नेहरु उर्जा मंडल 'के अंतर्गत संरक्षित करने का सुझाव दिया था लेकिन वक़्त बीता बात बीती ,अब केंद्र और राज्य सरकारें यहाँ सिर्फ बिजलीघरों का जमघट लगाने में जुटी हुई हैं ,इस पूरी अफरातफरी में रिहंद को अनदेखा किया जा रहा है जिसका नतीजा सामने हैं खतरा सिर्फ बिजलीघरों को ही नहीं है ,रिहंद के 400 किमी लम्बे जलागम क्षेत्र को भी है ,उत्तर भारत में अगर उर्जा समस्या को काबू में रखना है तो रिहंद को प्रदूषण मुक्त करने के साथ साथ केंद्र सरकार को तात्कालिक तौर पर 'हस्तक्षेप कर विशेष उर्जा प्राधिकरण का गठन करना चाहिए
बांधों के विशेषज्ञ अनिल सिंह कहते हैं शासन ने यदि रिहंद को प्राथमिकता नहीं दी तो आने वाले दिनों में न सिर्फ हमें ब्लैक आउट से जूझना होगा ,बल्कि मौजूदा संकट लगभग 20 हजार मेगावाट के उन बिजलीघरों के लिए भी तमाम चुनौतियाँ पैदा कर देगा जिनका निर्माण अभी रिहंद के तट पर प्रस्तावित है
प्रभात ख़बर से साभार ।

रविवार, 29 नवंबर 2009

अब पेड़ों को काटें नहीं, करें ट्रांसप्लांट.


अब सड़क के आड़े आने वाले पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं है। ट्रासप्लाट तकनीक से उन्हें दूसरे स्थान पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले बिश्नोई समाज के जनक गुरु जंभेश्वर महाराज के नाम से विख्यात गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय [गुजविप्रौवि] ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर पेड़ों को ट्रासप्लाट करने का करिश्मा कर दिखाया है।

इस तकनीक से विश्वविद्यालय के हार्टीकल्चर विभाग ने दो चरणों में खजूर के 38 पेड़ सफलता से ट्रासप्लाट किए हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण के आड़े आ रहे करीब 25 अन्य पेड़ों को भी ट्रासप्लाट करने का कार्य जारी है।

दरअसल पर्यावरणवादी संत के नाम से जुड़े इस विश्वविद्यालय में आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत गत अप्रैल माह में तब हुई, जब विश्वविद्यालय प्रशासन नेक [नेशनल एक्त्रिडीशन काउंसिल] की टीम के स्वागत की तैयारियों में जुटा हुआ था। विश्वविद्यालय को फिर से ए ग्रेड दिलाने के लिए हर क्षेत्र में सुधार किया गया लेकिन नए विश्वविद्यालय में पेड़ों से ज्यादा संख्या पौधों की थी। इसी दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति डा. डीडीएस संधू ने एक खबर पढ़ी की चीन में पेड़ों को ही ट्रासप्लाट कर दिया जाता है। इस पर उन्होंने विश्वविद्यालय के कार्यकारी अभियंता एवं हार्टीकल्चर विभाग के अध्यक्ष अशोक अहलावत से बात की। इसके बाद अहलावत ने इस पर काम शुरू किया।

उन्होंने विश्वविद्यालय के जंगल में खड़े 25 से 30 वर्ष पुराने खजूर के 18 पेड़ों को ट्रासप्लाट करवाया। यह कार्य इस वर्ष 5 अप्रैल से शुरू हुआ और लगभग एक सप्ताह में पूरा कर लिया गया। पेड़ों का ट्रासप्लाट पूरी सफल रहता है या नहीं, यह स्पष्ट होने में करीब छह माह का समय लग जाता है। ट्रासप्लाट किए गए 18 पेड़ों में 15 हरे-भरे शान से खड़े हैं। इसके बाद सिंतबर माह में खजूर के 20 और पेड़ों को ट्रासप्लाट किया गया। यह कार्य 20 सितंबर से शुरू हुआ और करीब 10 दिनों में पूरा कर लिया गया। इस चरण की सफलता के बारे में पूरी तरह जानकारी तो मार्च, 2010 में चल पाएगी लेकिन अभी इनमें से सारे पेड़ सुरक्षित व अच्छी हालत में हैं। इसके बाद जब विश्वविद्यालय के गेट नंबर तीन से प्रशासनिक भवन तक सड़क चौड़ी करने का काम शुरू हुआ तो इस काम के आड़े भी 25 पेड़ आ गए। चूंकि पेड़ों को काटना उचित नहीं होता, इसलिए इन पेड़ों को भी अब ट्रासप्लाट किया जा रहा है।

यह काम अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में शुरू हुआ है और दिसंबर के अंत तक इसके पूरा हो जाने की उम्मीद है।

रविवार, 22 नवंबर 2009

पति पत्नी संवाद


नई शादी के बाद और शादी के एक वर्ष बाद ... पति पत्नी संवाद ...



पतिः देर किस बात की है।

पत्नीः क्या तुम चाहते हो मैं चली जाऊँ?

पतिः नहीं, ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकता।

पत्नीः क्या तुम मुझे प्यार करते हो?

पतिः अवश्य!

पत्नीः क्या तुमने मुझे कभी धोखा दिया है?

पतिः कभी नहीं! ये तो तुम अच्छी तरह से जानती हो, फिर क्यों पूछ रही हो?

पत्नीः अब क्या तुम मेरा मुख चूमोगे?

पतिः इसके लिये तो मैं तो कोई भी अवसर नहीं छोड़ने वाला।

पत्नीः क्या तुम मुझे मारोगे?

पतिः मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो मैं ऐसा करूँगा?

पत्नीः क्या तुम मुझ पर विश्वास करते हो?

पतिः हाँ!

पत्नीः ओ डार्लिंग!!!

शादी एक वर्ष के बाद के लिये कृपया नीचे से ऊपर पढ़ें।

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शनिवार, 21 नवंबर 2009

कही इन्हे बेचा तो नही गया ?


वाराणसी के अखबारों में एक अच्छी ख़बर पढने को मिली । ख़बर थी जैतपुरा के पश्चात्यावर्ती महिला देखरेख संघठन में रह रही २२ संवासिनियो की जिला प्रशाशन के सहयोग से शादी करा दी गई , इस संगठन को दुसरे शब्दों में महिलाओ की जेल भी कहा जा सकता है जिसमे भूली बिसरी या घर से भाग आई और विवादों में पड़ी महिलाओ को रखा जाता है , इन महिलाओ को इनके परिजनों को संपर्क पर कानूनी प्रक्रिया के बाद वापस कर दिया जाता है । लेकिन बहुत सी लडकिया और महिलाये ऐसे भी है जो वर्षो पड़ी रहती है और उनका हाल जानने कोई नही आता , जिनके लिए जिला प्रसाशन ने वयवस्था कर राखी है की यदि कोई युवक इनसे विवाह करना चाहे तो क़ानूनी प्रक्रिया के तहत विवाह कर सकता है , इसी के तहत शुक्रवार को २२ लडकियों की शादी जिला प्रसाशन ने करा दी ।
२२ लडकिया जिस समय फेरे ले रही थी उस समय एक प्रश्न फ़िर से खड़ा हो गया था की क्या ये लडकिया सही हाथो में जा रही है या इन्हे कही अप्रैल २००६ की तरह पैसे लेकर बेचा तो नही जा रहा है , जी हां , ५ अप्रैल २००६ को एक न्यूज़ चैनल ने स्टिंग आपरेशन में दिखाया था की किस तरह संगठन की तत्कालीन अधीक्षिका गीता पाण्डेय ने महज पाच हजार में एक नपुंसक युवक से एक लड़की की शादी तय कर दी थी , स्टिंग में गीता पाण्डेय को पैसे लेते और ये कहते दिखाया गया था की , नपुंसक है तो कोई बात नही आप लोग दुल्हे का डाक्टर से सर्टिफिकेट बनवा करदे , हमें कागज से मतलब होता है ,
इस ख़बर के बाद गीता को तत्कालीन जिलाधिकारी राजीव अग्रवाल ने निलंबित कर दिया था , परन्तु जाँच के बाद जैसा हर बार होता है गुनाहगार निर्दोष साबित हो गया और गीता पाण्डेय बहाल भी हो गई , तब से कई बार इस चाहरदिवारी में शहनाई बज चुकी है लेकिन इस आवाज में २००६ की घटना की चीख दब जाती है ,और कभी किसी ने जानने की कोशिश नही की आख़िर शादी के बाद इन लडकियों कर क्या होता है ।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

ठाकरे कौन ? - अजय कुमार सिंह


शुक्रवार को मुंबई में आईबीएन-लोकमत के दफ्तर पर हमले के तुरंत बाद महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाद ने सख्त कार्यवाही का आश्वासन दिया तो लगा लंबे अरसे से नपुंसकों जैसा ब्यवहार कर रही महारास्ट्र सरकार की गैरत जाग गयी है। लेकिन थोड़ी ही देर में जाँच के लिए कमेटी बनाने की बात कहकर मुख्यमंत्री ने बता दिया की उनके पैजामे के नीचे कुछ नहीं है। बहरहाल काबिले तारीफ हैं लोकमत के वे पत्रकार जिन्होंने ठाकरे के सात गुंडों को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। देखें कि सामना के संपादक संजय राउत सिर्फ़ अपने दफ्तर में बैठकर ठाकरे के शत्रुओं को सबक सिखाने का बयान देते रहते हैं या फ़िर अपने पालतुओं की जमानत कराने थाने तक भी पहुँचते हैं। आईबीएन ७ - लोकमत को इस हमले से कोई नुकसान होने के बजाय फायदा ही हुआ है। मंदबुद्धि ठाकरे को भला क्या पता कि ऐसे हमलों से अब झोपड़पट्टी वाले भी नहीं घबराते। मीडिया वालों को तो उलटे फायदा ही होता है। इस हफ्ते की टैम रिपोर्ट आने दीजिये। पता चल जायगा कि शुक्रवार की शाम आईबीएन-लोकमत की टीआरपी कितनी बढ़ी।
कुछ दिन पहले ही राज ठाकरे के विधायकों ने विधानसभा में अबू आजमी से हाथापाई की थी। आजमी को भी इससे फायदा ही हुआ था। लेकिन सवाल उठता है कि महारास्ट्र की राजनीती में कभी गंभीरता से नहीं लिए गये चाचा-भतीजा अचानक पागल क्यों हो गये हैं। 'मातुश्री' नाम के एक मकान में जिन्द्गगी के आखिरी पड़ाव पर आराम से दिन गुजार रहे बाल ठाकरे को रिटायरमेंट के बाद फ़िर से काम पर लौटना पड़ा है। जाहिर है बाल ठाकरे को समझ आ गया है कि शिवसेना की दुकान बेटे उद्धव ठाकरे को सौंपना, उनकी गलती थी। नालायक उद्धव ने दुकान को बंदी के कगार पर पहुँचा दिया है। शिवसेना जैसी पुरानी दुकान से अच्छी तो राज ठाकरे की नई दुकान एम्एनएस चल पड़ी है। बेचारे बाल ठाकरे को बुढौती में दुकान पर बैठना पड़ रहा है। बहुत छोटी उमर से कम-धंधे में लग गये बाल ठाकरे को शायद पढ़ने का ज्यादा मौका नहीं मिला। उनका हिन्दी ज्ञान तो बिल्कुल ही सीमित है। इसीलिए हिन्दी की एक पुरानी कहावत 'पूत कपूत तो का धन संचय.........' उन्होंने नहीं। अन्यथा उद्धव के लिए अपना बुढ़ापा यों ख़राब नहीं करते।
कोई भी बता सकता है मराठी मानुस के नाम पर चल रही इस बकवास राजनीती में 'कुत्ता' प्रेमी राज ठाकरे (विधानसभा में अबू आजमी पर हमले वाले दिन राज ठाकरे की गोद में एक कुत्ता इठलाते देखा गया था) अपने चाचा बाल ठाकरे से काफी आगे निकल गये हैं। शुक्रवार को लोकमत के दफ्तर पर शिवसेना का ये हमला दरअसल 'बड़ा ठाकरे' कौन है यही साबित करने के लिए हुआ है। हाल में संपन्न हुए महारास्ट्र विधानसभा के चुनाव में करारी हार के बाद से ही बाल ठाकरे, राज ठाकरे को पछाड़ने लिए मचल रहे थे। दो दिन पहले ही बाल ठाकरे ने सचिन तेंदुलकर को मराठी से पहले ख़ुद को हिन्दुस्तानी कहने पर 'चाहेंट' लिया था। बाल ठाकरे ने जिस बात के लिए सचिन तेंदुलकर की निंदा की वो या तो जिन्ना मानसिकता का कोई ब्यक्ति ही कर सकता है या फ़िर कोई पागल।
ठाकरे के मुंह से निकलती ऐसी बकवास और उनके पालतुओं की ऐसी हरकत से साफ है महारास्ट्र की राजनीती में ठाकरे की कोई ओकात नहीं बची है। वोटर इनको पूछ नहीं रहा। चुनाव ये जीत नहीं पा रहे। अब ये तो सिर्फ़ सरकार की नपुंसकता है जो ये कभी सडकों पर ठेले-खोमचे-ऑटो वालों पर ताकत आजमाते हैं, कभी अमिताभ बच्चन के घर के सामने बोतलें फेंकते हैं, कभी रेलवे भर्ती परीछा में गये बच्चों को पीटते हैं, कभी विधानसभा में अबू आजमी से लड़ते हैं तो कभी लोकमत के दफ्तर पर हमला करते हैं।
ये भी साफ है कि ठाकरे पर लगाम कसने के लिए जनता और मीडिया द्वारा सरकार को दी जा रही 'शक्ति जागरण' ओसधियों का कोई असर क्यों नहीं पड़ रहा है। दरअसल सरकार और कांग्रेस को फिलहाल शिखंडी बने रहने में ही फायदा नज़र आ रहा है। 'जिन्हें' रोजगार के लिए सरकार के बाल नोचने चाहिए, बाल और राज ठाकरे ने उन्हें रोजगार दे रखा है। साथ ही मीडिया का पूरा ध्यान बेमतलब चाचा-भतीजा पर लगा है। सरकार को उसकी नाकामियों और जनता के असल सवालों पर घेरने वाला कोई है ही नहीं।
साभार -- छपाक ब्लागस्पाट डाट काम

A big shame









Dear All,


Please go through this and try to do your bit to save these very friendly animals. Sign the

protest list mentioned below and send on – this is serious…….

Denmark is a big shame
The sea is stained in red and in the mean while it’s not because of the climate effects of nature.


it's because of the cruelty that the (civilised) human beings kill hundreds of the famous and intelligent Calderon dolphins.
This happens every year in Feroe island in Denmark . In this slaughter the main participants are young teens.
WHY?
To show that they are adults and mature.... BULLLLsh
In this big celebration, nothing is missing for the fun. Everyone is participating in one way or the other, killing or looking at the cruelty “supporting like a spectator”

Is it necessary to mention that the dolphin calderon, like all the other species of dolphins, it’s near extinction and they get near men to play and interact. In a way of PURE friendship
They don’t die instantly; they are cut 1, 2 or 3 times with thick hoocks. And at that time the dolphins produce a grim extremely compatible with the cry of a new born child.

But he suffers and there’s no compassion till this sweet being slowly dies in its own blood
Its enough!
We will send this mail until this email arrives in any association defending the animals, we won’t only read. That would make us a cc omplices, viewers.

Take care of the world, it is your home!

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

बिकनी परेड








बिकनी परेड: ऑस्ट्रेलिया में होने वाली ये सबसे बड़ी स्वीमवीयर परेड भी है जिसमें 200 से ज्यादा प्रतियोगी सड़कों पर कुछ इस अंदाज में उतरे।
बिकनी परेड में न सिर्फ सुंदर बालाएं आईं बल्कि पुरुषों ने भी अपने स्वीमसूट पहनकर परेड में शिरकत की।
गिनीज बुक में बिकनी: ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हुई इस प्रतियोगिता में बिकनी पहने कई बालाओं ने हिस्सा लिया। इनका सिर्फ एक ही मकसद था कि किसी तरह गिनीज बुक में जगह बनाई जाए।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

मै आतंकवादी बनने जा रहा हूँ .


ये तस्वीर है वाराणसी के राजेंद्र वर्मा की जो जल्दी ही आतंकवादी बन जायेगे , राजेंद्र आख़िर आतंकवादी क्यो बनना चाहते है ?
ख़ुद राजेंद्र के अनुसार उनके सामने हालत ऐसे बन गए है की अब कई दूसरा रास्ता पेट पालन का नही बचा है ,राजेंद्र कुछ साल पहले बनारसी साड़ी के बड़े व्यापारी थे उनके ४०० लूम चलते थे ,निचीबागमें दुकान थी जिसका किराया ही वे ६० हजार देते थे ,मगर बनारसी साडी के कारोबार में पिछले कुछ सालो से जो मंदी आई है उसने उन्हें इस कदर तोड़ डाला की अब सारे लूम बंद हो चुके है
दुकान वापस चली गई ,बाद में आशापुर में एक स्कूल खोला लेकिन वो भी नही चला , अब दुसरे बुनकरों से साडिया लेकर घूम घूम कर बेचते है कभी बिक गई तो भोजन नसीब होता है नही बिकी तो सर पे उधारका बोझ थोड़ा और बढ़ जाता है
कभी ४०० बुनकर परिवारों को रोजगार देने वाला राजेंद्र अब अपने बेटो को पढ़ने की फीस जुटाने को मोहताज हो गया है ,विगत दिनों वाराणसी के शिल्प मेले में वो घूमता नजर आया उसके हाथ में एक थैला था जिसमे कुछ अच्छी किस्म की बनारसी साडिया थी ,जिन्हें वह शिल्प मेले में बेचने लाया था लेकिन अफ़सोस की उसे कोई खरीदार नही मिला ,क्योकि उसकी साडिया असली सिल्क की थी, जिसके कारन महगी थी और नकली तथा सस्ती साड़ी की कद्रदान बन चुके बनारसी लोग उसके साड़ी को खरीदने की हिम्मत नही बना रहे थे ,हताश हो चले राजेन्द्र को घर में बुझे चूल्हे को जलने की चिंता खाई जा रही थी ,अचानक एक दुकान पे कुछ देर गुमसुम खड़ा रहने के बाद उसके मुह से निकला , अब मै आतंकवादी बन जाउगा क्योकि दूसरा रास्ता दिखाई नही पड़ता ,
वहा खड़े लोग राजेन्द्र की बात पे हस कर आगे बढ़ गए लेकिन उसके शब्दों में छिपे अर्थ को शायद ही कोई समझ पाया हो ,
राजेन्द्र के ये शब्द बता रहे है की किस कदर बनारस की खुशहाली का पर्याय रहा बनारसी साड़ी उद्योग अब अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रहा है ,किस कदर नकली और चीन के सस्ते सिल्क से बने बनारसी साड़ी ने असली साड़ी को संग्रहालय की वास्तु बना दिया है ,किस कदर आधुनिक और रेडिमेड कपड़ो ने बनारसी कपड़े को लगभग समाप्त ही कर दिया है ,रही सही कसर सरकार ने बाल श्रम कानून की आड़ में पुरा कर दिया है जिसके कारन बुनकर अपने घर me भी बच्चो को बुनकारी नही सिखा सकते क्योकि उन्हें बच्चो से काम कराने का दोषी बनाकर या तो जेल भेज दिया जाता है या फिर इतना जुरमाना लगा दिया जाता है की उसे भरने में आधी जिंदगी गुजर जायेगी , ऐसे me भला कोई आतंकवादी बनने की सोचे तो बहुत आश्चर्य नही होना चाहिए ,राजेंद्र की बात और हालत देखकर मन ये सोचने को भी मजबूर करता है की जो लोग आज आतंकवादी बन चुके hai उनकी भी कहानी का नायक कोई राजेन्द्र ही तो नही होता ।

राजेंद्र वर्मा का पता -

७२ लोहिया नगर

आशापुर , वाराणसी

बुधवार, 4 नवंबर 2009

ये भी है बुलंद भारत की एक तस्वीर .


ज्यादा दिन नही बीते है जब देश भर के अखबारों और चैनलों में श्रीराम सेना द्वारा मंगलूर के एक पब में डांस कर रही लड़कियों की पिटाई की ख़बर प्रमुखता से देखने और पढने को मिल रहा था , वो लड़किया पब में, पेट पालने की की मज़बूरी में डांस कर रहा थी जिन्हें देखने बड़े घरो के बिगडे शहजादे जाते है लेकिन उन्हें किसी ने कुछ नही कहा । वो लड़किया ग़लत थी या सही , नही मालूम लेकिन कम से कम इतना तय है की वो नंगी होकर नही नाच रहा थी लेकिन शायद ये तस्वीरे देखकर आपको तुंरत यकीं नही होगा की की उत्तर भारत में कई स्थानों पे इस तरह के नंगे नाच बिगडैल शहजादों द्वारा आयोजित किया जा रहा है , और वो भी बाकायदा टिकट लगाकर , इस आयोजन से अच्छी कमाई हो रहा है , काफी लोग शामिल हो रहे, है देर रात तक तेज और अश्लील गाने बजते हैं , लेकिन श्रीरामसेना या अन्य कोई संस्कृति के ठेकेदार की नजर इसपे नही पड़ती जबकि बिहार के कुछ इलाको में

और हरियाणा चंडीगढ़ के आसपास के कुछ फार्महाउस इस तरह के आयोजन के लिये चर्चित है ।

यहाँ जो फोटो दिया गया है ये इसी तरह के एक आयोजन के एक एम्एम्एस से लिया गया है जिसमे आप saf देख सकते है इन लड़कियों के आसपास किस तरह कुछ बिगडैल युवक मस्ती में मदहोश हो रहे है , ये एम् एम् एस इन दिनों काफी चर्चे बटोर रहे है , लेकिन आश्चर्य इस बात का है की कानून के सरकारी या गैर सरकारी रखवालो की नजरे इन आयोजनों पे नही पड़ रहा है , और न ही पबो में लड़कियों को पीटने वाले सेनाओ का पुरुषार्थ जग रहा है ।

आख़िर क्यो ??????
















बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

गोरखपुर विश्वविद्यालय में गुंडा राज


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गोरखपुर विश्वविद्यालय में इन दिनों गुंडों का राज चल रहा है ,ये गुंडे दो तरह के है ,पहले वो है जो स्टुडेंट नही है मगर जबरन हॉस्टल में कब्जा जमकर वहीसे अपराधिक गतिविधिया चला रहे है ,जिसका एक खुलासा रविवार को हुआ जब पता चला की गौतम बुद्ध हॉस्टल के कमरा नम्बर ३२ में कृषि विभाग के एक पूर्व अधिकारी की हत्या कर लाश वही गटर में डाल दिया था ,दुसरे गुंडे वो है जो पहले वाले गुंडों को भागने के नाम पे परिसर में घूम कर गुंडागर्दी कर रहे है , जबसे बुद्ध हॉस्टल का मामला सामने आया है तब से तो मनो इनके गुंडागर्दी का लाइसेंस मिल गया है ,ये लोग परिसर में स्टुडेंट के साथ जो कर रहे है उसे देखकर इन्हे गुंडा कहना कही से ग़लत नही है क्योकि यह अधिकार किसी को नही है की किसी की सार्वजनिक स्थान पर पिटाई किया जाए और कान पकड़कर उठक बैठक कराया जाए । मगर विश्वविद्यालय के कुछ लोग इन दिनों यही काम कर रहे है , हां ये बात जरुर है की असली गुंडों को छेड़ने की ताकत और हौसला इनमे नही है क्योकि अबतक असलं गुंडों के खिलाब कोई कार्यवाही हुई है , कभी नही सुने पड़ा ।

ऊपर के विजुअल को क्लिक करे और देखे कौसे चल रहा है गुंडा राज

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

कही यह पूर्वांचल को अशांत करने की साजिश तो नही है ?


जैसी आशंका थी वही हुआ ,कम्पनी के मालिको ने कम्पनी में ताला लगा दिया । ४०० मजदुर एक पल में बेरोजगार हो गए ,गोरखपुर में पिछले २ महीने से चल रहे मजदुर आन्दोलन का यह अंत न होता यदि वामपंथियो और और कुछ तथाकथित बुद्दिजिवियो ने इनके आन्दोलनं को हाइजैक न कर लिया होता ।
वामपंथियो के मजदुर आन्दोलन में कूद जाने के ही समय यह पता चल गया था की इनका उद्देश्य मजदूरो की लडाई लड़नी नही बल्कि पूर्वांचल में अपने राजनीती की फसल बोनी है , और वे अपनी फसल बो कर हट लिये और मारा गया मजदुर । दरअसल इन लाल झंडे वालो को इस इलाके में इनका झंडा उठाने वाला कोई नही मिल रहा था क्योकि आर्थिक पिछडेपन के वावजूद यहाँ के लोग अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ कर ही लेते थे इलाके में दंगाईओ के लिये कोई जगह नही थी , सो सोची समझी राजनीती के तहत मजदूरो का भड़काया , आन्दोलन कराया और अब जो मजदुर तालाबंदी के कारन बेरोजगार हुए है उन्हें अब लाल झंडा पकड़कर यहाँ अशांति फैलायेगे । कुछ दिनों पहले यहाँ के सांसद योगी आदित्यनाथ ने इन आन्दोलन करने वालो को नक्सली और वामपंथी कहा था तो लोगो ने काफी विरोध किया था , उन विरोध करने वालो से हमारा पूछना है की ये नक्सली नही तो क्या है जिन्होंने सैकडो मजदूरो से राजगार छीन लिया और अभी न जाने कितने गरीब और नासमझ लोगो को gumrah karege ,अब तो उन को भी रहत मिल ही गयी होगी जो इनकी वकालत करते फ़िर रहे थे .

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

विजय तो वामपंथियो की हुई है .

गोरखपुर में मालिको के शोषण के खिलाफ चल रहा मजदूरो का आन्दोलन गुरुवार की शाम प्रशासन द्वारा मजदूरो की शर्ते मान लेने के आश्वाशन के साथ समाप्त ho गया ।
प्रशासन द्वारा दिए गए आश्वासन को ये सीधे साधेमजदुर अपनी विजय मान रहे है ,साथ ही इनके आन्दोलन को हाइजैक करने वाले वामपंथी इसे अपने संघर्ष की विजय बताकर मजदूरो के जबरन नेता बननेकी कोशिश कर रहे है और मजदूरो के मन में ये बात बैठा दिया है की बिना लाल झंडे वालो के ये लडाई वो नही जीत पाते
लेकिन सबसे बड़ा सच तो ये है की मजदुर एक बार फ़िर बेचारा ही साबित हुआ है क्योकि शर्ते मनवाकर जीसे वो अपनी लडाई का अंत मान रहे , दरअसल वो इनके पराजय और पराभव की शुरुआत है ,दुर्भाग्य ये है की समय की खतरनाक आहट को मजदुर भाप नही पाए है । मजदूरों ने ये जानने की कोशिस भी नही की, कि अबतक अड़ियल रुख वाले ये मालिक और और प्रशासन के लोग अचानक एक साथ सभी शर्ते क्यो मान गए । अनुभव कि भाविस्यवानी मानकर मजदूर नोट कर ले शर्ते मानने का लालीपाप दिखाकर उनके आंदोलन को दबाने की ये एक कोशिश है आने वाले दीनो मे इन मजदूरो को पहले तो इनकी सारी सुभिधाये , जिनकी ये माँग कर्रहे थे दी जाएगी लिकिन फिर एक एक कर इनकी ना सिर्फ़ छटनी किया जाएगा बल्कि ऐसे हालत पैदा कर दिए जायेगे की मजदुर ख़ुद इस नौकरी को सलाम कर दे ,

इतिहास गवाह है इससे एक बड़ा आन्दोलन कालीन नगरी भदोही और मिर्जापुर के कालीन बुकर मजदूरो ने किया था , आन्दोलन से परेशां , मालिको ने पहले तो मजदूरो की बात मान ली , बाद में पुरे कालीन उद्योग में काम की परिभाषा ही बदल गई , कालीन कंपनियो के मालिको ने कालीन को कारखाने के बजाये ठेके पे देकर घरो में बनवाना शुरू कर दिया , आज वही लोग अपने घरो में कालीन बुनते है मगर पैसा सिर्फ़ उतना ही मिलता है जीतनी मीटर कालीन बनती है, जबकि कंपनी में यही मजदुर ८ घंटे काम कर बंधी तनख्वाह पाते थे, लेकिन इनके आन्दोलन ने इनका ही नुकसान किया । वही हालत अब गोरखपुर में बनती दिख रही है जहा राजनीती का बंजर झेल रहे वामपंथियो ने अपनी फसल बोने के लिये इन मजदूरो को गुमराह कर आन्दोलन का बिज बो दिया है जिसकी फसल पिछले एक महीने में काफी उग आयी है जिसे लाल सलाम करने वाले अब और खाद दे रहे है , आन्दोलन में उन्हें अभी जो शुरूआती विजय दिख रही है उसका मतलब मजदुर भले न जाने मगर वामपंथी अच्छी तरह जान रहे है की अब मजदूरो के मुख जो खून लग गया है उसका स्वाद मजदूरो को मिले न मिले उन्हें जरुर मिलेगा और मन्दिर एवं हाते में जकडे गोरखपुर की राजनीती में लाल झंडा भी जरुर लहराएगा ।
मजदुर एक बार फ़िर बेचारा साबित होगा , फ़िर कोई इन्हे मोहरा बनाएगा , समय का ये चक्र चलता रहेगा मजदुर इसी तरह पिस्ता रहेगा

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

ये भी शौक है

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009 को मेलबर्न में नेकेड ब्रंच के दौरान पोल डांस से लोगों का मनोरंजन करते कलाकार एंथनी क्लिव। ऑस्ट्रेलिया में मेलबर्न फ्रिंज फेस्टीवल के दौरान ऐसी पार्टी आयोजित की जाती है।नेकेड ब्रंच पार्टी की सोच पैदा करने वाली नताली बेक के मुताबिक उन्हें ऐसी पार्टी का विचार अप्रैल की गर्मियों के दौरान आया, जब उन्होंने सोचा कि बगैर कपड़ों की पार्टी का आइडिया काफी मस्ती भरा अनुभव हो सकता है। नेकेड ब्रंच में मनोरंजन करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के कई कलाकार भी हिस्सा लेते हैं। खासतौर पर इसमें एडिनबर्ग कॉमेडी फेस्टीवल के हास्य कलाकार अपना हुनर पेश करते हैं।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

जाको राखे साईया......




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बड़ी पुरानी कहावत है जाको राखे साईया मार सके न कोई ,लेकिन जो अपनी जान की परवाह न कर दुसरे की जान बचाने को अपनी जान जोखिम में डालने का हौसला रखता हो उसे भला मरने की हिमाकत कौन कर सकता है आख़िर ऊपर वाले को भी कही तो जवाब देना ही होगा । इस बात को साबित कर दिया उत्तर प्रदेश रोडवेज के बस चालक अजय यादव ने जिसने मंगलवार की रत गोरखपुर बलिया मार्ग पे सामने से आ रही ट्रक से भिडंत हो जाने से ट्रक के सामने लगा एक लोहे का राड uसके पेट में घुस कर पीछे से निकल गया लेकिन इस हालत में भी अजय ने हिम्मत से काम लिया और बस को बगल की खाई में गिरने से बचाकर ३ दर्जन यात्रियो की जान बचा ली । ट्रक का लोहा अजय के पेट में इस कदर घुसा था की उसे गैस क़तर से काट कर निकला गया और अजय को उसी हालत में गोरखपुर लाया गया जहा एक प्राइवेट अस्पताल में डॉक्टरो ने बड़ी मसक्कत से अजय के पेटसे लहे का राड निकला । फिलहाल अजय की हालत अभी गंभीर है और वो अभी जीवन और मौत के बिच संघर्ष कर रहा है , लेकिन जिस बहादुरी और हौसले का परिचय उसने दिया है वो वाकई न सिर्फ हैरान करने वाला बल्कि उसके सहस को सलाम करने वाला है ।
आप भी इश्वर से प्राथना करे की अजय की हालत जल्दी ठीक हो जाए .

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

ऐसे ही मोक्ष देती रहो माँ


गंगा को मोक्षदायनी यु ही नही कहते ,हकीकत में माँ गंगा सदियों से हमें मोक्ष देती आई है .उनका तो पृथ्वी पे आगमन ही सागर पुत्रो को मोक्ष देने के लिये ही हुआ था । गंगोत्री से गंगा सागर तक के अविरल कल कल यात्रा में माँ गंगा हमें कई रूपों में मोक्ष देती है ,कही खेत के लिये पानी तो कही पीने के लिये, हर जगह माँ हमें तृप्त करती आ रही है ,बनारस के घाट हो या संगम का किनारा चाहे हरिद्वार का तट हर जगह माँ हमारे पाप धोती है इतना ही नही गंगा माँ अपने किनारे रहने वाले गाव कसबे शहर की आबादी को अपने माध्यम से रोजगार देकर भी मोक्ष दे रही है ,चाहे गाव में गंगा में मछली मरने वाला हो या पूजा पाठ कराने वाले पंडे ,लाश जलाने वाले डोम हो या नाविक ,माँ सभी को किसी न किसी रूप में मोक्ष दे रही है ,अब तो इधर कुछ वर्षो से माँ बड़े नेताओ अधिकारियो स्वयसेवी संस्थाओ के लोग और सामाजिक कार्यकर्ताओ को भी मोक्ष देने लगी है ,इस नए वर्ग को माँ १९८८ से तब मोक्ष देने लगी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने गंगा प्रदुषण परियोजना की शुरुआत की थी

इस परियोजना में अब तक अरबो खर्च हो गए लेकिन उसके बाद भी लगातार मैली होती जा रही गंगा माता ने कभी शिकायत नही की बल्कि इस परियोजना के पैसे से लोगो को मोक्ष देती रही ,न जाने कितने अधिकारी ,कर्मचारी ,सामाजिक कार्यकर्त्ता लगातार मोक्ष की ओर बढ़ रहे है इसकी गिनती नही है

,तुलसी घाट किनारे रहने वाले महंथ बीरभद्र जी को भी माँ ने खूब मोक्ष दिया ,आख़िर वो भी कितना करते है माँ के लिये हर साल ५ जून को सैकडो बच्चो को एक दुसरे का हाथ पकड़ा कर घाट पे खड़ा कर देते है ,बड़े बड़े सेमिनार करते है बिल क्लिंटन से मिलते है ,सो उन्हें थोड़ा ज्यादा मोक्ष मिलना चहिये हो सकता है मिल ही रहा हो ।

आजकल माँ, स्वामी अविमुक्तेश्वर नन्द को भी खूब मोक्ष दे रही है वो तो बनारस से लेकर संगम तक मोक्ष लेनें में लग गए है लगातार काम कर रहे है सो इन्हे भी मोक्ष मिलना चाहिए आख़िर क्यो न मिले जब बाबा रामदेव गंगा पे बोल सकते है तो घाट पे रहने वाले क्यो न ले ,

इस बिच बनारस में कुछ मोक्ष लेने वालो ने न जाने क्यो मोक्ष पाने का प्रयास ही बंद कर दिया ,उनमे से एक है रामशंकर जी पेशे से पत्रकार है गंगा किनारे रहते है कुछ साल पहले रक्षत गंगाम आन्दोलन शुरू किया लेकिन लगता है तब तक गंगा का सारा मोक्ष समाप्त हो चुका था सो रामशंकर जी वापस हो लिये ,नये मोक्ष खोजने वालो में एक ज्योतिष लक्ष्मण शास्त्री भी है जो कई सच्ची भविष्यवाणी करने का दावा करते है लेकिन ये कभी नही बतया की माँ कब तक प्रदुषण से मुक्त होगी इधर कुछ दिनों से माँ को प्रदुषण मुक्त कर मोक्ष पाने वालो ने नए उत्साह से काम शुरू कर दिया क्योकि केन्द्र सरकार ने भी गंगा के लिए कुछ कर बदले में मोक्ष पाने के प्रयास शुरू करते हुए माँ गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है .इतना ही नही अभी कुछ दिनों पहले विश्व बैंक से माँ गंगा के सफाई के लिये ३ बिलियन डालर की सहायता मिली है ,निसंदेह इस बड़े धन से माँ गंगा का प्रदुषण समाप्त हो या न हो लेकिन इतना तय है की सदियों से हमें मोक्ष देने वाली माँ फिर एक काफी बड़े वर्ग को मोक्ष देने जा रही है ।

देती रहो माँ ऐसे ही मोक्ष देती रहो ।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

लाश के सौदागर पत्रकार

videoगोरखपुर के महिला चिकित्सालय में मंगलवार को रात के अंधेरे में इन्सान के कई चहरे दिखाई पड़े ,इंसानों की इस भीड़ में खड़े ये सारे लोग अपने अपने नाम के साथ समाज का कोई न कोई सम्मानित पदजोड़े थे ,कोई पत्रकार था तो कोई डॉक्टर ,कोई पुलिसवाला था तो सामाजिक कार्यकर्त्ता । इस भीड़ में सभ्य से दिखने वाले ये ज्यादातर चेहरे दरअसल एक नकाब में थे लेकिन रात के अंधेरे में इनके चहरे से कुछ समय के लिये नकाब उतरा तो दिखा ये तो साक्षात् शैतान और नरपिशाच है ,कुकर्मी और अधर्मी है । इन शैतानो के चेहरे से नकाब उतरा एक महिला की लाश ने ,दरअसल संजू नामक उस महिला जिसके पेट में ७ माह का कन्या गर्भ था वो महिला अस्पताल में गर्भपात कराने आयी थी मगर अस्पताल में पहुचने से पहले ही अस्पताल के दलालों ने संजू और उसके पति को शिकंजे में ले लिया उसे बताया की ७ माह के बच्चे का गर्भपात नही होता ,संजू को मानो पेट में पल रही बेटी से पीछा छुडाना ही था ,दलालों ने १००० रुपये में सौदा तय किया और अस्पताल परिसर में ही एक कर्मचारी के आवास , जिसे दलालों ने छोटा अस्पताल का रूप दे रखा था में संजू का गर्भपात कर दिया ,लेकिन ७ माह का बच्चा होने के कारन संजू की हालत बिगड़ गयी उसे खून निकलने लगा जिससे गर्भपात करने वाली दाई और नर्से के माथे पे पसीना आ गया और मामला बिगड़ता देख रात के लगभग ९ बजे उन्होंने संजू को महिला अस्पताल में भरती करा दिया ,अधिक खून निकलने से संजू की हालत लगातार बिगति जा रही थी वो कराह रही थी लेकिन वहा पहुचे कुछ पत्रकारों की बाछे खिल गई ,पत्रकारों ने अस्पताल के कर्मचारियो से मामले को दबाने की मोलतोल शुरू कर दिया था , इसी बिच एक लोकल चैंनल का रिपोर्टर वहा पहुच कर अपना कैमरा निकला ही था की मोलभाव में लगे दुसरे पत्रकार ने उसे धमकी देते हुए कहा की अगर ये ख़बर चल गए तो समझ लेना , अचानक सूचना मिलाती है की संजू की मौत हो गई , थोडी ही देर में कई पत्रकार पहुच गए मगर आधी रात के समय पत्रकारिता का पवित्र पेशा रंडी (इस शब्द के लिये क्षमा करे ) के पेशे से बदतर दिखा जब पत्रकार दो खेमे में देखे , एक वे थे जो फटाफट अपने डेस्क पे ख़बर नोट करा और ब्रेक कर रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो लाश का सौदा कर रहे थे ये लोग गर्भपात करने वालो को कानून बता कर भयभीत कर रहे थे ,जैसे उन्हे मालूम था की भय जितना बढेगा ख़बर न छपने की कीमत भी उतनी बढेगी ,इतना ही नही लाश के इन सौदागरों ने भय और बढ़ने के लिये मृतक के पति राजकुमार जो की रिक्शा चालक था से कहलवाकर रिक्शा संघ के लोगो को अस्पताल बुलकर हंगामा शुरू करा दिया , हंगामा सुनकर पुलिस भी आ गई कुछ पत्रकार अपनी ख़बर कर वापस लौट गए थे लेकिन पत्रकारिता को कोठे तक पहुचाने का कसम खाए कुछ पत्रकार अभी वही थे। अचानक हंगामा बंद हो गया ,पुलिसवाले वापस लौट गए संजू का पति जो अबतक अपनी पत्नी के मौत के लिये अस्पताल के कर्मचारियो को दोषी ठहरा रहा था ,अब इसे अपनी बदकिस्मती बताने लगा । इतना ही नही उसे आनन फानन वे अस्पताल से विदा कर दिया गया ,और अब वो कहा है किसी को नही मालूम ।

बताने की जरुरत नही है ऐसा क्यो हुआ होगा , रही सही शक सुबह के अख़बार ने यकीं में बदल दिया

प्रदेश के सबसे बड़े अख़बार का दावा करने वाले अख़बार में संजू नदारद थी

एक अन्य बड़े ब्रांड ने ख़बर को बड़े ही हलके और अनमने तरीके से लिख कर खानापूर्ति कर ली जबकि एक अख़बार ने संजू की मौत संदिग्ध अवस्था में बताया

सुबह १० बजे प्रेस क्लब पे जब पत्रकार इकठ्ठा हुए तो वह सिर्फ़ एक ही चर्चा हुई , कौन कितना पाया ,इस बात की चर्चा कोई नही कर रहा था की कन्या भ्रूण हत्या करने वाले ,सरकारी अस्पताल में अवैध गर्भपात कराने वाले ,एक महिला की जान लेने वालो के खिलाफ कुछ किया जाए ,क्योकि पत्रकारिता लाकतंत्र का चौथा स्तम्भ है , उसका फ़र्ज़ है लोकतंत्र की जनता की हिफाजत करना ,

संजू तो मर गई मगर उसकी मौत ने पत्रकारिता पे कई सवाल खड़े कर देये है जिनका जवाब हमें खोजना है ताकि हम इस पेशे की नई परिभाषा बना सके जिसमे सबकुछ हो मगर पवित्रता आदर्श त्याग जूनून निडरता जैसे शब्द न हो क्योकि जो पत्रकारिता मंगल के अँधेरी रात में देखने को मिली उसमे उपरोक्त शब्द अपना अपमान करा रहे है बेहतर तो यही हो की ये शब्द अपनी पहचान कही और बनाने की कोशिश करे , और पत्रकारिता को वो सबकुछ करने दे जो आज के ये लम्पट करना चाहते है । साथ ही अब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्भा नही बल्कि लोकतंत्र का स्वयम्भू गुंडा कहना चहिये ।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनलफेलोशिप प्रोग्राम 2010


The Ford Foundation International Fellowships Program (IFP) seeks to build a new generation of social justice leaders in India by offering access to quality higher education. IFP especially supports candidates from groups that have historically lacked access to higher education.
In the last eight years, IFP India has selected 280 Fellows for Masters and PhD degrees. Of these, 200 Fellows have already completed their studies. Over seventy five percent have returned to India to begin careers in the social sector creating value for their regions and communities. IFP India helps returned fellows (alumni) raise their capacities through knowledge, skills and networks to become effective leaders working to improve lives in their communities.
Applications for 2010 are now open. Applicants should :
� Be Indians currently residing and working in the states of Bihar, Chhattisgarh, Gujarat, Jammu & Kashmir, Jharkhand, Madhya Pradesh, Orissa, Rajasthan, Uttar Pradesh or Uttarakhand. They should have faced some socio-economic disadvantage in their access to quality education.
� Hold a Bachelor’s or a Master’s degree from a recognized Indian university with at least 55% marks.
� Have at least three years’ full-time work experience relevant to their proposed area of study. They should also have experience in leadership and community service or development related activities.
Forty candidates will be selected following an intensive search and selection process. The Pre Application and Final Application Forms will be reviewed and evaluated by panels of experts from academia, the social development sector and other related disciplines. Shortlisted candidates will be further screened through regional and national interviews.

The IFP India Program will assist selected fellows in university admission process, paying for travel, tuition fees, living costs and logistical arrangements related to their study programs. The Information Sheet and Pre-Application Form can be downloaded from http://www.ifpsa.org/ The deadline for pre-applications is 15 December 2009.

The Information sheet and Pre-Application form are enclosed. Please pass this on to eligible candidates and encourage them to apply. Thank you so much for your support.

We would also appreciate it if you could email us at ask@ifpsa.org the full addresses and contact details of 10 important persons (from NGO's, Academia & Media) in your state to whom we can also forward IFP materials for dissemination.

शनिवार, 26 सितंबर 2009

रविवार, 20 सितंबर 2009


ईद और दशहरा के अवसर पर
नौतनवा आदर्श नगरपालिका परिषद् के समस्त सम्मानित जनता को
हार्दिक शुभकामनाये
गुड्डू खान
चेयरमैन
आदर्श नगरपालिका परिषद् नौतनवा
महराजगंज
अपने नगर को साफ सुथरा और स्वक्ष रखे ,

गरीबों को न्याय...आख़िर कब !

videoसामूहिक रूप से प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर पुलिस के लाठी चार्ज की घटनाएँ तो अक्सर सुनी जाती है ! लेकिन अपने वाजिब हक के लिए आमरण अनसन पर अपने पति के साथ बैठी किसी दलित महिला की पिटाई की तस्वीरें आपने शायद ही देखि हों ! तो पहले आप साथ के दृश्य को देखें...!शायद आप भी आखिरी दृश्यों को देखकर भावुक हो उठे ! अपने पति को अकारण पिटता देख एस.डी.एम्. को तमाचा जड़ने वाली इस महिला की पीडा दशकों पुरानी है ! ये घटना भी १३ जून २००२ को कुशीनगर कलेक्ट्रेट में घटित हुई थी ! कप्तानगंज छेत्र के लोहेपार गाँव में दबंगों से जमीनी विवाद का दंस झेल रहे दलित रामप्रीत उस समय अपनी पत्नी के साथ कलेक्ट्रेट परिसर में न्याय मिलने की आस में ही आमरण अनसन पर बैठे थे !बढ़ी हुई दाढ़ी, खद्दर का कुरता और सिने पर तिरंगा लगाये रामप्रीत ने घटनाक्रम से पहले यही सोचा था की यहाँ तो उसकी जरूर सुनी जायेगी! लेकिन डी.एम्.साहेब से मिलने की रट लगाने के कारण उसको एस डी एम्, डी एस उपाध्याय चांटा जड़ देंगे ,ऐसा उसने बिल्कुल ही नही सोचा था ! जब रामप्रीत पीटा जा रहा था तो पांच दिनों के आमरण अनसन से काफी हद तक टूट चुकी उसकी पत्नी को ये सब नही देखा जा सका और उसने भी एक तमाचा एस डी एम् को जड़ दिया ! उसके बाद जो हुआ आपने भी देखा होगा कि एस डी एम् अपने दो रायफल धारी जवानों और ड्राईवर के साथ कैसे उस महिला पर टूट पड़े ! यह खबर टी.वी.और पेपर की headline बनी लेकिन बात शायद एक Greeb की थी इस कारण कुछ ही दिनों में prakran ठंडा pd गया !उस समय सरकार जो भी थी vo भी न्याय की ही बात करती थी लेकिन हुआ कुछ नही !रामप्रीत के chehre से दाढ़ी और purana jajba अब bhle gayab dikhta हो लेकिन उसकी likhapdhi आज भी jari है !गाँव से ujadkar ab katanganj में एक paan की gumti chlane का काम करने wale रामप्रीत का khna है की सब कुछ तो khatm हो गया देखा जाए कब कौन सरकार न्याय देती है....!ये prashn शायद आज भी jinda है की aakhirkar garibo की कौन sunega............!report-u पी live न्यूज़ buro

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

गरीबों की पीडा...! प्रशासनिक कहर...और मीडिया की चूप्पी !

videoअपने ज़माने में केन्द्र सरकार में मंत्री रहे मरहूम डॉक्टर सैयद मुहम्मद की देवरिया जिले की सैकडों एकड़ जमीन इन दिनों विवादों के कारण चर्चा में है ! चर्चा काफी तेज है की देवरिया जिला मुख्यालय से करीब १५ कि.मी.दूर छोटी गंडक नदी के किनारे भीखमपुर और बघरा गाँव की ग्राम समाज की उस जमीं पर जहाँ किसानो के फसल लहलहा रहे है ,गरीबों के पट्टे आवंटित है ,पर देवरिया तहसील प्रशासन बड़े ही सुनियोजित तरीके से एक बसपा बिधायक के नजदीकी रिश्तेदार को कब्जा दिलाने के अभियान में जुटा हुआ है !सच से सीधे रूबरू होने यु.पी.लाइव न्यूज़ की टीम जब मौके पर पहुची तो पीडितों ने बताया कि गाँव के गरीब किसानो कि कास्तकारी की जमीनों के साथ-साथ तीन अनुसूचित और तीन मुस्लिम जाति के पट्टेधारकों की जमीं पर प्रशासन नजर गडाये हुए है ! बरहज के बसपा बिधायक और उनके सांसद पिता के दबाव में प्रशासन काम कर रहा है ! उनके एक रिश्तेदार को जबरिया कब्जा दिलाने के प्रयास मे प्रशासन आए दिन यहाँ लाठी चार्ज तो कभी महिलाओं पर कहर ढा रहा है लेकिन स्थानीय मीडिया की चुप्पी ने हम सबको तोड़ कर रख दिया है !अपने जमीनों के कागजात दिखाते हुए लोगों ने बताया की वर्ष-२००६ मे जिस प्रभारी कानूनगो ने पट्टे की जमीनों के कागजातों मे काटपीट किया था उस पर तत्कालीन जिलाधिकारी एस.वी.एस.रंगाराव ने कार्यवाही करते हुए अनुसूचित जाति एंव जनजाति आयोग को भी पुरे प्रकरण से अवगत कराया था !ग्रामीणों ने पुरे प्रकरण से मुख्यमंत्री कार्यालय को भी अवगत कराने की भी बात की !उनका कहना था की बिधायक जी के दबाव मे तहसील प्रशासन ऊपर तक सही सूचना नही भेज रहा है ! यु.पी.लाइव न्यूज़ टीम ने प्रकरण से जुड़े बिधायक से भी उनका पछ लेने की कोसिस की लेकिन उनके मोबाइल स्विच ऑफ़ मिले !सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय का नारा देनेवाली सरकार के एक प्रतिनिधि के कारनामो को देखकर जनता तो हैरान है ! आप भी देखें और सोचें की कैसे मिलेगा इन्हे न्याय.................!

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

स्टुडेंट या गुंडे

video

चोरी और सीनाजोरी ,ये कहावत आपने जरुर सुनी होगी ,लेकिन कभी आँखों से देखी है सीनाजोरी ?

ऊपर के विजुअल में आपको दिखेगा सीनाजोरी का नजारा ,दरअसल ये स्टुडेंट है गोरखपुर के एक महाविद्यालय के जो अभी तक अपना परीक्षा रिजल्ट नही आने से इतने खफा हो गए की मंगलवार को महाविद्यालय में जमकर हंगामा किया और कुर्सी मेज तोड़ डाले ।

इन स्टुडेंट का रिजल्ट इसलिये रोक दिया गया है की इस महाविद्यालय में सामूहिक नक़ल की शिकायत मिली थी ,लेकिन स्टुडेंट मानने को राजी नही है की उन्होंने नक़ल किया है । बहरहाल इन होनहार स्टुडेंट ने अपने व्यव्हार से प्रमाणित कर दिया की उन्होंने नक़ल किया था या नही ?,कम से कम पढने वाला स्टुडेंट तो ऐसे हरकत नही करेगा की जिस कुर्सी मेज पे पढता हो उसको ही तहस नहस कर डाले , आपको क्या लगता है क्या ये सीनाजोरी नही है ?

शनिवार, 12 सितंबर 2009

अंक पत्र का khel

video

सरकार को चूना.........!

सरकारों का घाटे में चलने का रोना तो सभी ने सुना होगा लेकिन सवाल यह है की जब सरकारी तंत्र में जमे लोग ख़ुद ही अपना जेब और पेट दोनों भरने पर उतारू हो जायें तो सरकारों को तो रोने का नाटक करना ही पड़ेगा ! साथ के दृश्य को देखें.....! नजारा है गोरखपुर -कुशीनगर के बीच हाईवे का , खुलेआम सड़कों पर दौड़तीं सरकारी रंग में रंगी डग्गामार बसों ने पिछले कई वर्षों में करोड़ों का चूना सरकार को लगा दिया! हाईवे पर ही दोनों जिलों के ए.आर.टी.ओं.और परिवहन विभाग के अधिकारी तो अक्सर जमे दीखते है और पुलिस विभाग की तो बात ही मत करिए ! सभी मौजूद है ,फिर भी कोई इन अवैध बसों को रोकने की कोशिस नही करता,कारण चाहे जो भी हो लेकिन सरकार को चूना तो सीना ठोंक कर लगाया जा रहा है !बात अधिकारिओं की तो यह भी साफ़ है की उनकी जेब तो ये धंधेबाज जरूर ही भर रहे होंगे ! सरकार चाहे बहन जी की हो या किसी और की लेकिन इन अधिकारिओं के कारनामों से सरकार कों जहाँ चूना लग रहा है वहीं जनता को कस्ट भोगने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है ! कैसे होगा समस्या का निदान ये तो सरकार कों ही सोचना पड़ेगा !

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

video

अनोखे गजराज

अरे....वो देखो हाथी ख़ुद ही हैंडपंप चला कर नहा रहा है !पढ़कर चोंक गए न !मै भी उस समय ऐसे ही चौंका था !लेकिन जब ये नजारा मैंने देखा था तो हाथी के बच्चे के खेल को देखते देखते घंटों समय कब बीत गया ,पता ही नही चला !मै उस समय ई.टी.वी.के लिए काम करता था तो कैमरा भी साथ था तो जो मजेदार नजारा मैंने उस समय कैद किया था तो मैंने सोचा की यु .पी.लाइव के नए ब्लॉग के जरिये आप सभी से शेयर करुँ ! तो आप भी देखें और आनंद लें .................! द्वारा -एस .पी .राय-कुशीनगर

बुधवार, 9 सितंबर 2009

अंक पत्र का खेल

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड उ.प्र के अत्यन्त गोपनीय दस्तावेजो में से एक सादी मार्कशीट शिक्षा माफियाओ ने विभाग के लोगो से मिलजुल कर हासिल करलिया है !मेरे भी एक जरूरतमंद साथी ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया लेकिन मुझे उनकी बातों पर यकीं तब हुआ जब हमारे कैमरे ने सादी मार्कशीट का चित्र कैद कर लिया ,कैमरे के साथ साथ जिसने भी देखा सभी अचम्भित! लेकिन जब हम खोजबीन में लगे तो पता चला की एक क्या, जितने चाहिए उतने मिल जायेंगे बस चाहिए मुहंमाँगा दाम .... इस काम को करने वाले शिक्षा जगत से जुड़े कुछ माफिया अरे सीधे कहे तो गुरु जी[कुछ लोग] ही इस धंधे में खुलेआम सिर्फ़ रुपया बनाने के लिए उतर आए हैं! कुशीनगर तो इस प्रकार के धंधों का केन्द्र बन चुका है १ शिक्षा विभाग सब जनता है लेकिन कौन पडे लफडे में !क्योंकि पैसा तो सबको प्यारा है !आपको भी देखना हो तो आप भी देख लें बोर्ड की मार्कशीट बनने से पहले कैसे दिखती है!क्योंकि हो सकता है कल आपको भी ...........! रिपोर्ट -एस.पी .राय-कुशीनगर

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

ये प्यार का नशा है

videoये साहब भी है ,अंगूर के बेटी के कारन इसी तरह रहते है ,जिसके प्यार में जब ये डूबता है तो इसे कुछ पता नही रहता ,पेशे से सिपाही साहब महराजगंज में तैनात है एक दिन जब प्यार इनपे हावी हुआ तो इन्हे कंधे पे लाद कर लोगो ने थाने पहुचाया ,आप भी देखिये और मजा लीजिये

शनिवार, 29 अगस्त 2009

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर

videoगोरखपुर में एक बार फ़िर तार तार हुई महिला की इज्जत ,पहले गमला देवी को बाल काट कर गाव से निकल दिया ,अब बुधिया को पंचायत ने बदचलन बना कर उसके मुख में कालिख पोत कर गाव में घुमाया ,इस काम में उसका पति भी शामिल रहा । बहरहाल १५ दिनों में इस तरह की लगातार दूसरी घटना से प्रशासन भी हिल गया और उसके पति को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है जबकि ये तुगलकी फरमान सुनाने वाले प्रधानपति और बी डी सी फरार हो गए है जिन्हें पुलिस रताश रही है ।

आख़िर महिला मुख्यमंत्री और महिला राष्ट्रपति ,महिला लोकसभा अध्यक्ष वाले इस देश में महिलाओ के साथ इया तरह बर्ताव क्यो हो रहा है ,क्या कर रही है मायावती ,सोनिया गाँधी ,प्रतिभा पाटिल और मीरा कुमार जैसी महिलाओ की झंडाबरदार , इस बारे में अपनी राय हमें जरुर दे आप चाहे तो इस ब्लॉग पे भी लिख सकते है ,इसके लिए आप हमें अपना मेल एड्रेस हमें भेज दे हम आपको ब्लॉग पे लिखने के लिए निमंत्रण भेजेगे ।

अपना ई मेल एड्रेस फ़ोन। ९५९८०८७८७७ पे या uplive2009@याहू.इन पे भेज दे

बुधवार, 26 अगस्त 2009

भूतो के डर से भागे दरोगा जी



videoअभी तक आपने देखा और सुनाहोगा की पुलिस के डर से आम आदमी किस कदर भागता किसी को भी दौड़ा कर पिट देती है मगर कुछ कुछ दिनों पूर्व मामला पुलिस के लिए उल्टा तब पड़ गया जब पुलिस की भिडंत भूतो से हो गयी ,और भूतो ने पुलिस वालो को घेर लिया और वहा गए दरोगा और सिपाहियों को भागना पड़ा ,घटना महराजगंज की है ,पुलिस को सुचना मिली की एक गाव में एक तांत्रिक आया है जो भुत भागने का दावा कर जनता को बेवकूफ बना रहा है ,फ़िर क्या था पुलिस और कुछ प्रसासनिक अधिकारी मौके पर पहुच गए और वो भी दंग रह गए वहा का हाल देखकर ,एक पेड़ के निचे आग जलाकर एक महिला बैठी थी ,और लगभग २० लड़किया और महिलाए बदहवास होकर जमीं पर लोटपोट रही थी और इस तरह हरकत कर रही थी मनो उनके सर पे भुत सवार हो ,पुलिस के जाने पर तांत्रिक फरार हो गया और पुलिस ने वहा रखे तंत्र मंत्र के सामान तोड़ डाले , फिर क्या था महिलाओ पे सवार भूतो को भी गुस्सा आ गया और उन्होंने पुलिस वालो को घेर लिया ,अब पुलिस को समझ नही आ रहा था की इनसे क्या बात करे क्योकि सभी महिलाये अपना सुधि खो चुकी थी और पुलिस पे चढी जा रही थी । पुलिस वाले अबतक पसीने पसीने हो चुके थे क्योकि भुत बनी महिलाये अब इन्हे बिन बुलाये आने वाले आफत लग रहे थी अंत में दरोगा जी करते क्या ,क्योकि भूतो से तो पाला पड़ा नही था सो उन्होंने सोचा धीरे से निकल लो भलाई इसी में है सलामत रहे तो दो चार का एनकाउंटर , कर प्रमोसन मिल ही जाएगा , और दरोगा जी अपने सिपाहियों समेत भाग लिये वहा से ।

ऊपर के विजुअल क्लिक करे और देखे भूतो का हंगामा

रविवार, 23 अगस्त 2009

ओझं सरनम गच्छामि

गोरखपुर में पुलिस इन दिनों अपराधियों को पकड़ने के लिए ओझा और सोखो का सहारा ले रहे है ,सूत्रों की माने तो पुलिस अब खुफिया नेटवर्क के बदले ओझाओ से नेट्वर्किंग कर रही है ,इस सन्दर्भ में अमर उजाला ने आज एक ख़बर भी प्रकाशित की है जिसे आप इस लिंक http://www.amarujala.com/today/gkpnews.asp?city=23GKP4M.asp को क्लिक कर पढ़ सकते है

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

औरत नही ये तो मर्द है

video

निचे की ख़बर में आपने देखा गमला देवी की दास्ताँ ,लेकिन हर महिला गमला की तरह जुल्म बर्दास्त नही करती बल्कि अपने पे आ जाए तो अच्छे अच्छे की हालत पतली कर देती है । यहाँ हम आपको दिखा रहे है बनारस के कुछ जुझारू महिलाओ को जिन्होंने पुलिस से भी दो दो हाथ करने में गुरेज नही है ,ये घटना तो पुरानी है जमीं पे कब्जे को लेकर ग्रामीणों और पुलिस में ठन गयी ,पुलिस ने लोगो को भागने के लिये लाठिया चलाई लेकिन महिलो ने भे जमकर मुकाबला किया । ये पुरानी घटना इसलिये भी याद आ गयी क्योकि मन में ये प्रश्न उठ रहा था की आख़िर जहा इस तरह की हौसले वाली महिलाये है वही गमला जैसी महिलाये क्यो जुल्म सहती है ।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

क्या यही है ६२ साल का आजाद भारत ?

videoदेश इस साल जब आजादी के जश्न की तैयारी करने में मशगुल था ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद में एक महिला को ,उसके ही पति और लड़को ने ऐसे अपमानित हाल में दुनिया की नजरो में ला खड़ा किया जो १५ अगस्त १९४७ से पहले भी महिलाओ के साथ नही होता था ।
पिपराइच थाना के कोनी गाव की गमला देवी नमक ५० वर्ष की महिला उसके पति और लड़को ने १३ अगस्त को उसपर बदचलनी का आरोप लगाकर पहले तो उसकी पिटाई की उसके बाद उसके सर के बाल काट डाले और बिच सर में बाल को छील कर अर्ध मुंडन कर घर से निकल दिया ,
घटना के बाद गमला देवी पुलिस स्टेशन जा कर थानेदार से इस घटना की शिकायत भी की ,लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी ,थक हार कर गमला वापस गाव लौट गयी । घटना की जानकारी जब पत्रकारों को हुई तो कुछ पत्रकार कोनी गाव गए और घटना की जानकारी के बाद जब पुलिस स्टेशन गए और ये जानना चाहा की मामले पे पुलिस ने क्या
किया ,तो वहा बैठे थानेदार साहब ने जो कहा उसे सुन कर सभी पत्रकार स्तब्ध रह गए ,थानेदार साहब ने उल्टे गमला देवी को चरित्रहीन बताते हुए पत्रकारों से ही पूछा ,की यदि जिसकी औरत दुसरे मर्द के साथ भाग जायेगी तो वो क्या करेगा ?
अगर आप भी सुनना चाहता है की दरोगा ने क्या कहा तो निचे के विजुअल में देखे और सुने , ये बाते कुछ पत्रकारों ने{ जब दरोगा जी कैमरे के सामने बोलने से इंकार कर दिया } चुपके से रिकार्ड कर लिया था ।
बातचीत के अंश इस प्रकार है
दरोगा -बजरंगी सिंह ,इसको रखा है बहुत दिन से video
पत्रकार -महिला को रखा है ?
दरोगा -साल भर पहले इसको लेकर वो भाग गया
पत्रकार -बज्रंगिया ?
दरोगा -हु
पत्रकार -अच्छा --फिर
दरोगा -साल भर ये सब लेकर रहे पता नही कहा --तो इधर आयी है दो चार दिन से तो अब वो घर में रहना चाह रही है तो उसके --कोई किसी की औरत भाग जायेगीऔर माँ भाग जायेगी साली इस उमर में
पत्रकार -हु हु
दरोगा -मतलब उसकी उमर ५० साल होगी उसके लड़के की शादी है पतोह है
पत्रकार -५० साल की है
दरोगा -और क्या ? तब तो मरे होगे फैमली वाले ,ऐसा नही है की किसी अन्य जात द्वारा मारा गया हो
पत्रकार -ह ह ह
दरोगा -ये कोई बहुत बड़ी ख़बर नही है लेकिन आप लोग जो इच्छा करे छाप दीजिये -कोई बड़ी ख़बर नही है ये तो उसका है, व्यक्तिगत पारिवारिक मामला
पत्रकार -कभी कोई कार्यवाई हुई तो थानेदार है मुकदमा --
दरोगा -मुकदमा , तो क्या ,उसका पति मारा है उसके खिलाफ मुकदमा लिखायेगा
पत्रकार -बाल काटना क्या अपराध नही है ?
दरोगा -मान लो पिता जी आपके बाल काट देये तो कौन सा बड़ा अपराधी होगे ,हमको बता दीजिये मान लो आप से गुस्सा गए ,ये आम बात है हम लोग छोटे छोटे थे बाल बड़े बड़े रखते थे ,बाल पकड़ कर छिलवा दिया जाता था ,
पत्रकार - और आप उसी उम्र में मुकदमा दर्ज कराने चले गए होते तो कानून आपका मुकदमा दर्ज करता
दरोगा -नही करता
पत्रकार -आपकी इच्छा के विपरीत --
दरोगा -वों तो मे जानता हु लेकिन हर चीज का
पत्रकार -वो तो एक अलग बात है की माँ बाप --
दरोगा -आपकों ये मारते (बगल के आदमी की तरफ़ इशारा करते हुए )तब वो अपराध है , लेकिन वो इतना आवारा टैप की साली है जिसके बड़े बड़े बेटे है और इस उमर में भाग कर किसी दुसरे के साथ रह रही है
पत्रकार -भइया उसका नमवा जरा बता दीजिये
दरोगा -नमवा तो उसका सिपाही को दे दिया हु
पत्रकार -पासवान ,---पासी --दलित तो ये होते नही है ?
दरोगा -दलित होते है
एक अन्य -दलित है
दरोगा -दलित ये भी है ,दलित वो भी है , इसमे कौन बड़ी बात है ,आय -ह , ह।
पत्रकार -दूसरा कोई करता --
दरोगा -हु -तब तो ख़बर बनती --ऐसा है इ गुंडई नही न है ,बात समझ रहे है हमारी आप ,यहाँ पे गुंडई नही है ,जो गुंडई शब्द है --जिसकी माँ ५० साल उमर में आवारा गर्दी करेगी उसका लड़का कैसे गाव में जीता होगा वही जनता होगा
पत्रकार - सही बात आप --
ये वार्तालाप सुनकर आप समझ गए होगे की आज भी इस आजाद देश में कानून कौन और कैसे चलता है ,
कितना सुरक्षित है आम आदमी का मानवाधिकार , कितनी लाचार है महिला ६२ साल के आजाद भारत में ,।
ये घटना इस बात को तो प्रमाणित कर ही देती है की भले ही राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री जैसे पदों पर महिला बैठी हो ,देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को एक महिला अपने इशारे से चला रही हो ,लेकिन महिला आज भी सिर्फ़ बेचारी ,बेचारी और सिर्फ़ बेचारी ही है । इतना ही नही गमला देवी जैसे महिलाओ की ये दशा एक प्रश्न ये भी खड़ा कर रही है की पुरूष प्रधान देश में महिलाये कैसे इतनी आगे पहुच गयी है ? क्या है राज ? जो गमला देवी नही जान पाई ।

बरहाल घटना के ४ दिन बीत गए है और गमला को न्याय नही मिला । इस बारे में पुलिस का कहना है की उसने मुकदमा लिखाया ही नही और उसका पति से समझौता हो गया है ।
हमारे कानून में ऐसे कोई धारा शायद नही है जो गमला जैसी महिलाओ को न्याय दिला सके ?हां ऐसा ऐसा नियम जरुर है की जबरन समझौता करा दिया जाए
क्या जरुरत नही है ऐसे कानून और व्यवस्था को बदलने की या यु कहे की पिछले ६२ सालो में हमें तो आदत पड़ गयी है इसी तरह जीने की ????//?????