बुधवार, 29 जुलाई 2009
Guidelines for the media
Guidelines for the media in addressing the issue of
child sexual abuse
• Media should bring the issue of child sexual abuse into the realm
of public knowledge and public debate. It is important that the
issue of sexual abuse is presented as a serious violation of rights,
not only as an offence against children.
• Media should, through sensitive and meaningful projection and
coverage of the issue, be instrumental in creating a sense of moral
indignation and outrage over incidents of child sexual abuse.
Media should also take care to ascertain the facts, context and
circumstances. A report on such sensitive issues should not be
filed based on superficial interviews with persons supposedly
witnesses to the incident.
• Media should desist from the temptation to sensationalize or
exaggerate a particular incident of child abuse.
• When media reports an incident of sexual abuse it should also
report subsequently on actions taken by concerned authorities and
continue to report till action is taken to punish the abusers.
• Media should not unwittingly glorify the act of sexual abuse by
giving undue prominence to the perpetrator.
• The victim should not be further victimized or made to relive the
trauma he/she has been through.
• Under no circumstances should the media disclose or reveal the
identify of the victim. Masking techniques should be used wherever
the victim is made to give a first person account of his/her
experience. The victim, relatives and concerned persons must be
assured of confidentiality.
• Media should not create a prurient interest in the sexuality of the
child by image or innuendo
• The child should not come across as a passive entity.
• Besides drawing attention to the problem of child sexual abuse,
the media also needs to enlighten the public as what can be done
to prevent such incidents, and what needs and must be done if
such an incident has taken place, including providing information
on legal or other remedies.
• Media should provide its target audience with full knowledge about
the rights of the child and the legal remedies available to a child in
the unfortunate event of a case of child sexual abuse occurring.
मंगलवार, 28 जुलाई 2009
रक्षा बंधन पर भाइयो से कर रही गुहार बेटिया
घर भर को जन्नत बनाती है बेटियाँ॥!अपनी तब्बुसम से इसे सजाती है बेटियाँ॥
पिघलती है अश्क बनके ,माँ के दर्द से॥!
रोते हुए भी बाबुल को हंसाती है बेटियाँ॥!

सुबह की अजान सी प्यारी लगे॥,
मन्दिर के दिए की बाती है बेटियाँ॥
सहती है दुनिया के सारे ग़म,
फ़िर भी सभी रिश्ते .निभाती है बेटियाँ
मन्दिर की आरती मस्जिद की अजान बेटियाँ गुरुग्रंथ गीता बाईबल कुरान बेटियाँ
हंसती मुस्कुराती खिलखिलाती बेटियाँ
हर मुश्किल को हंस के सुलझातीं बेटियाँ
माँ बाप की आंखों का तारा बेटियाँ
उनके बुढापे का सहारा बेटियाँ
हर अल्फाज़ का इशारा बेटियाँ हर खुशी का नजारा बेटियाँ
फूल सी बिखेरती है चारों और खुशबू,
फ़िर भी न जाने क्यूँ मार दी जाती है बेटियाँ
एक नहीं दो परिवारों की शान है बेटिया भाई के कलाई की पहचान है बेटिया
रविवार, 26 जुलाई 2009
बुधवार, 1 जुलाई 2009
क्या भगवान बुद्ध भगोडे थे .

बौध धर्म की स्थापना करने वाले भगवान बुद्ध के बारे में शायद ही कोई हो, जो न जानता हो . मै तो बनारस का होने के कारन अक्सर सारनाथ जाता हूँ और उनके चरणों में शीश नवाता हूँ ,मैंने थोड़ा बहुत बौध दर्शन भी पढ़ा है जिससे मै प्रभावित भी हूँ मेरा मानना है कि शान्ति और अहिंसा का संदेश देने वाला बुद्ध का दर्शन अतुलनीय है और मानवता के नजरिये से मानव के रूप में महा मानव थे । लेकिन आज मेरे एक साथी ने मुझसे एक ऐसा सवाल पूछा कि मै जवाब नही दे सका और उसे नास्तिक ,कम्युनिस्ट जैसे उपाधियों नवाज दिया लेकिन उसने जाते जाते अपना सवाल दुहराते हुए बोला कि जिस भगवान बुद्ध को तुम पूजते हो वो तो एक भगोड़ा था जो जीवन कि समस्याओ इन्सान के कस्ट से घबराकर अपने दूध मुहे बच्चे और पत्नी को छोड़ कर सत्य ( gyan ) कि खोज में चला गया जबकि उस समय और आज का सबसे बड़ा सत्य यही है कि जो जनम लेता है उसे मरना पड़ता है फिर वो कौन सा ज्ञान प्राप्त करने गए थे और उस ज्ञान से क्या उन्होंने मौत और शारीरिक तकलीफों का विकल्प तलाश लिया । नही खोज पाए बुद्ध इसका विकल्प ,फिर क्या गलती थी उनके दुधमुहे और उनकी पत्नी की ?इसका जवाब कौन देगा क्या इसका जवाब उन भगोडे लोगो के पास है जो ख़ुद उसी रह पे चलकर ख़ुद को बुद्ध के अनुयाई कहते है । मित्र हो सकता है मै ग़लत हूँ तो सच क्या है क्या बुद्ध भगोडे नही है ,कम से कम गीता पढने वाला तो उन्हें भगोड़ा ही कहेगा क्योकि भगवतगीता के अनुसार ,यहाँ कोई अपना नही है ,जो आया है उसे जाना है किसी से मोह मत करो युद्ध करो ...................... फिर भगवान बुद्ध के दर्शन की प्रासंगिकता रह ही कहा जाती ,अगर आप अब भी सहमत नही है की बुद्ध भगोडे थे तो इतना तो मानना पड़ेगा की भगवत गीता की बात फालतू है ।
इस प्रश्न का जवाब मेरे पास तो नही है लेकिन मै परेशां जरुर हु क्योकि हिंदू होने के नाते भगवत गीता में मेरी पुरी आस्था है और गीता को मै जीवन का आधार मानता हूँ और बुद्ध को भी पूजता हूँ ,मेरा मन आज इस बात से व्यथित है और आपको मै अपनी व्यथा लिख रहा हूँ
कृपया आप ही बताये की सच क्या है।
बुधवार, 27 मई 2009
क्योकि आप भूल जाते है

बंगाल की शेरनी के नाम से मशहूर हो चुकी ममता बनर्जी अब भारत की रेल मंत्री है ,बंगाल में चुनाव की सफलता के बाद लोगो में उनका कद अचनक बढ़ गया है ,और अब उनका गुड़गान हो रहा है लेकिन कुछ दिनों पहले ही सिंगूर से टाटा को वापस चले जाने के बाद लोगो में यही ममता खलनायक बन गई थी और उनको विकास विरोधी करार दिया गया था ,सिंगूर कांड के बाद ममता के प्रति विरोध करते हुए किसी ने उनको कुछ इस कदर मानते हुए एक फोटो ब्लॉग पे दाल दी थी । चुकी जनता पिछली बातो को भूल जाती है इसलिए हम ममता दीदी के इस फोटो से आपको कुछ याद दिलाना चाहते है ।
आपको याद आया कुछ ?
मंगलवार, 26 मई 2009
ये एनीमेशन नही है
कर रहा है ,वोडाफोन के इस विज्ञापन के पात्रो के बारे में लोगो का ये भी कौतुहल है की ये एनीमेशन है या कुछ और ?
आपको जानकर जरुर आश्चर्य होगा की ये कोई एनीमेशन नही बल्कि किसी के दिमाग की उपज है जिसे उसने कुछ अनोखे ड्रेस मुखवटे के तरह बनाकर अपनी कल्पना को विज्ञापन के रूप में शूट कर लिया जिसमे ये पात्र
अब तो आपको इन फोटो को देख इतना पता हो ही गया होगा की ये एनीमेशन नही बल्कि हाईटेक्निक की विज्ञापन है जिसमे आपको कुछ पल आँखों से देखी पे भी भ्रम हो सकता है ।
मंगलवार, 19 मई 2009
बनारस का जलवा

फैशन के शहर पेरिस में इन दिनों वाराणसी के बुनकरों के बनाये कपड़ो की धूम मची है इतना ही नही फ्रांस के एथिकल फैशन शो में बनारस के कपड़ो से बनो आधुनिक परिधानों का अलग ही जलवा देखने को मिला है । एसा पहली बार हुआ की बनारस के बुनकरों के हाथो बने कपड़े और ड्रेस में मॉडल ने रैंप पर चहलकदमी की ,
बनारस के डूबते हथकरघा उद्योग के लिए निसंदेह यह न सिर्फ़ एक गौरव की बात है बल्कि एक संदेश भी है की ईमानदारी से किया गया एक प्रयास इस उद्योग को फिर से अपनी पहचान दिलाने के साथ बनारस से पलायन कर रहे बेरोजगारों को रोजगार दे सकता है ,और इसे हकीकत में कर दिखाया है उपासना और वाराणसी वीवर्स नामक एक संस्था ने ,इस संस्था ने बनारस के एक दर्जन गावं में बुनकरों को रोजगार देकर उनका जीवन स्तर बदल डाला है ,कल तक बुनकारी छोड़कर रिक्श्वा चलाने को मजबूर ये बुनकर अब अपने घर में काम कर हर माह ६ से ७ हजार कमा रहे है । इस प्रोजेक्ट को बनारस में संचालित कर रही श्रीमती दीप्ती ने इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया की इस प्रोजेक्ट की मुख्य सूत्रधार ओरोविल पोंडिचेरी की संस्था उपासना है जिसकी प्रमुख उमा प्रजापति के प्रयास और डेनमार्क के बेस्टसेलर के आर्थिक सहयोग से ये योजना चलायी जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य बनारस की इस प्राचीन और जीवंत कला को फिर से पहचान दिलाने के साथ बुनकरों को सूदखोरों और साडी के गद्दिदारो ,बिचौलियों से मुक्त कर ख़ुद में स्वरोजगार बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना है ।
संस्था के जानने के लिए आप http://varanasiweavers.org/ जाए
बनारस के डूबते हथकरघा उद्योग के लिए निसंदेह यह न सिर्फ़ एक गौरव की बात है बल्कि एक संदेश भी है की ईमानदारी से किया गया एक प्रयास इस उद्योग को फिर से अपनी पहचान दिलाने के साथ बनारस से पलायन कर रहे बेरोजगारों को रोजगार दे सकता है ,और इसे हकीकत में कर दिखाया है उपासना और वाराणसी वीवर्स नामक एक संस्था ने ,इस संस्था ने बनारस के एक दर्जन गावं में बुनकरों को रोजगार देकर उनका जीवन स्तर बदल डाला है ,कल तक बुनकारी छोड़कर रिक्श्वा चलाने को मजबूर ये बुनकर अब अपने घर में काम कर हर माह ६ से ७ हजार कमा रहे है । इस प्रोजेक्ट को बनारस में संचालित कर रही श्रीमती दीप्ती ने इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया की इस प्रोजेक्ट की मुख्य सूत्रधार ओरोविल पोंडिचेरी की संस्था उपासना है जिसकी प्रमुख उमा प्रजापति के प्रयास और डेनमार्क के बेस्टसेलर के आर्थिक सहयोग से ये योजना चलायी जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य बनारस की इस प्राचीन और जीवंत कला को फिर से पहचान दिलाने के साथ बुनकरों को सूदखोरों और साडी के गद्दिदारो ,बिचौलियों से मुक्त कर ख़ुद में स्वरोजगार बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना है ।
संस्था के जानने के लिए आप http://varanasiweavers.org/ जाए
रविवार, 17 मई 2009
हिंदू कौन?
लंदन। ब्रिटेन के एक विद्यालय ने दाखिले के आवेदन प्रपत्र में हिंदुत्व की अनोखी परिभाषा दी है। विद्यालय के अनुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को हिंदू माना जाएगा जो हर दिन ईश्वर की पूजा करते हैं, मंदिर में धार्मिक कार्यों में शरीक होते हैं और मांसाहारी भोजन एवं धूम्रपान से दूर रहते हैं।लंदन के ‘हैरो’ स्थित ‘कृष्णा अवंती प्राथमिक विद्यालय’ ब्रिटेन का पहला हिंदू विद्यालय है जिसे सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जाती है। हैरो ऐसा क्षेत्र है जहां ब्रिटेन की किसी भी अन्य काउंसिल की तुलना में सबसे अधिक हिंदू आबादी है। सितम्बर, 2008 में छात्रों के पहले बैच के दाखिले के लिए आवेदन प्रपत्र में हिंदूत्व की एक नई परिभाषा दी गई है। विद्यालय प्रशासन के मुताबिक ऐसे लोगों को हिंदू कहलाने का अधिकार है जो हर दिन घर पर या मंदिर में ईश्वर की पूजा करते हैं। वे हिंदू ग्रंथों, विशेष तौर पर ‘भगवद्गगीता’ में बताए गए मार्गों का अनुसरण करते हों। हिंदू कहलाने के लिए यह भी आवश्यक है कि वे कम से कम हफ्ते में एक बार मंदिर के धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हों। हिंदू कहलाने के लिए मांसाहारी भोजन, शराब, धूम्रपान से दूर रहना भी जरूरी है।इस विद्यालय का प्रायोजक एक स्वतंत्र चैरिटी संस्थान ‘आई- फाउंडेशन’ है। इस संस्थान के प्रवक्ता ने बताया, ‘‘ऐसा नहीं है कि जो लोग हिंदुत्व की इस परिभाषा पर खरे नहीं उतरते, उनके आवेदन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। केवल 30 सीटें होने की वजह से निश्चित तौर पर हम उन लोगों को वरीयता देंगे जो इन कसौटियों पर खरे उतरते हैं।’’उन्होंने कहा कि हिंदुत्व को परिभाषित करने के लिए इन मानदंडों को बनाना बिल्कुल सही है। ऐसा कर हम समझ सकते हैं कि कौन हिंदू धर्म को सही तरीके से अपना रहा है।
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काशी की गलियाँ
बाबा विश्वनाथ, मंदिर, घाटों एवं अन्य मंदिरों के लिए मशहूर उत्तरप्रदेश की धार्मिक नगरी कही जाने वाली काशी की गलियाँ आधुनिकता एवं व्यावसायिकता के चलते अपना पुरातन स्वरूप खोती जा रही हैं।बढ़ती आबादी एवं व्यावसायिकता का वर्चस्व कायम होने के कारण इन गलियों के बुनियादी ढाँचे में भी परिवर्तन किए जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो इनका मौलिक रूप ही विलुप्त हो गया है।बढ़ते अतिक्रमण ने इन गलियों को और सँकरा बना दिया है। इसका उदाहरण है काशी विश्वनाथ मंदिर की गली जहाँ पर लोगों का चलना मुश्किल हो गया है।बनारस की गलियों का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितनी पुरानी काशी है। इन गलियों में जहाँ किसी समय वेद की ऋचाएँ, भजन-कीर्तन एवं राम चरितमानस का पाठ गूँजता था वहीं उनका स्थान अब भौड़े एवं अश्लील गीतों ने ले लिया है।इन्हीं गलियों में कभी हिन्दी के युग प्रवर्तक साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अपनी साहित्य यात्रा का श्रीगणेश किया था तो महाकवि जयशंकर प्रसाद को काव्य का प्रसाद भी इन गलियों से ही मिला था।इन्हीं गलियों ने अंग्रेजों के होश गुम कर दिए थे। काशी की भौतिक संरचना में स्नायुतंत्र की तरह फैली हुई गलियों के कोने में जज्ब है इस शहर का समूचा इतिहास।इन्हीं गलियों में आज भी लाखों-करोड़ों रुपए का रोज व्यवसाय होता है। सुप्रसिद्ध बनारसी साड़ियों का काम इन्हीं गलियों से होता है। इन गलियों में बहुमंजिले भवनों की भरमार है।देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा विश्वनाथ, अन्नपूर्णा एवं बाबा कालभैरव समेत अनेक प्राचीन एवं नामी मंदिर इन्हीं गलियों में मौजूद हैं, जहाँ पर पहुँचने के लिए पैदल जाने के अलावा कोई साधन नहीं है। मरने के बाद महाश्मशान मणिकर्णिका पर पहुँचने के लिए भी इन्हीं गलियों से होकर गुजरना पड़ता है।वाराणसी में एक ओर जहाँ लोग धूप एवं गर्मी से त्रस्त हैं, वही इन गलियों में रहने वाले लोग कूलर का मजा ले रहे हैं। गर्मी एवं लू का भी इन गलियों पर कोई असर नहीं पड़ता। इन गलियों में हमेशा तरावट और ठंड रहती है।इन गलियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये गंगा के घाटों से जुड़ी हैं। गंगा स्नान करने वाले इन्ही गलियों से होकर रोज घाटों पर जाते हैं। दुनिया का कोई ऐसा सामान नहीं जो इन गलियों में न मिले।इन गलियों में विदेशी सैलानी भी भ्रमण करते मिल जाते हैं। अब तो यहाँ बड़े-बड़े रेस्टोरेंट एवं होटल खुल गए हैं, जहाँ पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। इन गलियों में संगीत एवं योग सिखाने वाले भी रहते हैं।अब तो स्थिति यह है कि लोगों ने अपने घरों में रेस्टोरेंट एवं साइबर कैफे खोल रखे हैं। दशाश्वमेध के बंगाली टोला से लेकर हरिश्चंद्र घाट तक दर्जनों साइबर कैफे खुल गए हैं जहाँ पर विदेशी पर्यटक कम्प्यूटर पर बैठे रहते हैं।इन गलियों में जहाँ तमाम खूबियाँ हैं वहीं इनमें तमाम गलत काम भी होते हैं। इनमें अफीम, चरस समेत तमाम मादक द्रव्यों का धंधा भी होता है।वाराणसी के लोगों का मानना है कि काशी की इन गलियों में 'मिनी भारत' बसता है। किसी गली में मराठियों की आबादी है तो किसी में गुजरातियों एवं मद्रासियों की। आन्ध्रप्रदेश एवं तमिलनाडु के लोगों का यहाँ अलग ही मोहल्ला बसा है।
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