
राजेंद्र वर्मा का पता -
७२ लोहिया नगर
आशापुर , वाराणसी
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राजेंद्र वर्मा का पता -
७२ लोहिया नगर
आशापुर , वाराणसी
ज्यादा दिन नही बीते है जब देश भर के अखबारों और चैनलों में श्रीराम सेना द्वारा मंगलूर के एक पब में डांस कर रही लड़कियों की पिटाई की ख़बर प्रमुखता से देखने और पढने को मिल रहा था , वो लड़किया पब में, पेट पालने की की मज़बूरी में डांस कर रहा थी जिन्हें देखने बड़े घरो के बिगडे शहजादे जाते है लेकिन उन्हें किसी ने कुछ नही कहा । वो लड़किया ग़लत थी या सही , नही मालूम लेकिन कम से कम इतना तय है की वो नंगी होकर नही नाच रहा थी लेकिन शायद ये तस्वीरे देखकर आपको तुंरत यकीं नही होगा की की उत्तर भारत में कई स्थानों पे इस तरह के नंगे नाच बिगडैल शहजादों द्वारा आयोजित किया जा रहा है , और वो भी बाकायदा टिकट लगाकर , इस आयोजन से अच्छी कमाई हो रहा है , काफी लोग शामिल हो रहे, है देर रात तक तेज और अश्लील गाने बजते हैं , लेकिन श्रीरामसेना या अन्य कोई संस्कृति के ठेकेदार की नजर इसपे नही पड़ती जबकि बिहार के कुछ इलाको में
और हरियाणा चंडीगढ़ के आसपास के कुछ फार्महाउस इस तरह के आयोजन के लिये चर्चित है ।
यहाँ जो फोटो दिया गया है ये इसी तरह के एक आयोजन के एक एम्एम्एस से लिया गया है जिसमे आप saf देख सकते है इन लड़कियों के आसपास किस तरह कुछ बिगडैल युवक मस्ती में मदहोश हो रहे है , ये एम् एम् एस इन दिनों काफी चर्चे बटोर रहे है , लेकिन आश्चर्य इस बात का है की कानून के सरकारी या गैर सरकारी रखवालो की नजरे इन आयोजनों पे नही पड़ रहा है , और न ही पबो में लड़कियों को पीटने वाले सेनाओ का पुरुषार्थ जग रहा है ।
आख़िर क्यो ??????

गोरखपुर विश्वविद्यालय में इन दिनों गुंडों का राज चल रहा है ,ये गुंडे दो तरह के है ,पहले वो है जो स्टुडेंट नही है मगर जबरन हॉस्टल में कब्जा जमकर वहीसे अपराधिक गतिविधिया चला रहे है ,जिसका एक खुलासा रविवार को हुआ जब पता चला की गौतम बुद्ध हॉस्टल के कमरा नम्बर ३२ में कृषि विभाग के एक पूर्व अधिकारी की हत्या कर लाश वही गटर में डाल दिया था ,दुसरे गुंडे वो है जो पहले वाले गुंडों को भागने के नाम पे परिसर में घूम कर गुंडागर्दी कर रहे है , जबसे बुद्ध हॉस्टल का मामला सामने आया है तब से तो मनो इनके गुंडागर्दी का लाइसेंस मिल गया है ,ये लोग परिसर में स्टुडेंट के साथ जो कर रहे है उसे देखकर इन्हे गुंडा कहना कही से ग़लत नही है क्योकि यह अधिकार किसी को नही है की किसी की सार्वजनिक स्थान पर पिटाई किया जाए और कान पकड़कर उठक बैठक कराया जाए । मगर विश्वविद्यालय के कुछ लोग इन दिनों यही काम कर रहे है , हां ये बात जरुर है की असली गुंडों को छेड़ने की ताकत और हौसला इनमे नही है क्योकि अबतक असलं गुंडों के खिलाब कोई कार्यवाही हुई है , कभी नही सुने पड़ा ।
ऊपर के विजुअल को क्लिक करे और देखे कौसे चल रहा है गुंडा राज

गोरखपुर में मालिको के शोषण के खिलाफ चल रहा मजदूरो का आन्दोलन गुरुवार की शाम प्रशासन द्वारा मजदूरो की शर्ते मान लेने के आश्वाशन के साथ समाप्त ho गया ।



गोरखपुर के महिला चिकित्सालय में मंगलवार को रात के अंधेरे में इन्सान के कई चहरे दिखाई पड़े ,इंसानों की इस भीड़ में खड़े ये सारे लोग अपने अपने नाम के साथ समाज का कोई न कोई सम्मानित पदजोड़े थे ,कोई पत्रकार था तो कोई डॉक्टर ,कोई पुलिसवाला था तो सामाजिक कार्यकर्त्ता । इस भीड़ में सभ्य से दिखने वाले ये ज्यादातर चेहरे दरअसल एक नकाब में थे लेकिन रात के अंधेरे में इनके चहरे से कुछ समय के लिये नकाब उतरा तो दिखा ये तो साक्षात् शैतान और नरपिशाच है ,कुकर्मी और अधर्मी है । इन शैतानो के चेहरे से नकाब उतरा एक महिला की लाश ने ,दरअसल संजू नामक उस महिला जिसके पेट में ७ माह का कन्या गर्भ था वो महिला अस्पताल में गर्भपात कराने आयी थी मगर अस्पताल में पहुचने से पहले ही अस्पताल के दलालों ने संजू और उसके पति को शिकंजे में ले लिया उसे बताया की ७ माह के बच्चे का गर्भपात नही होता ,संजू को मानो पेट में पल रही बेटी से पीछा छुडाना ही था ,दलालों ने १००० रुपये में सौदा तय किया और अस्पताल परिसर में ही एक कर्मचारी के आवास , जिसे दलालों ने छोटा अस्पताल का रूप दे रखा था में संजू का गर्भपात कर दिया ,लेकिन ७ माह का बच्चा होने के कारन संजू की हालत बिगड़ गयी उसे खून निकलने लगा जिससे गर्भपात करने वाली दाई और नर्से के माथे पे पसीना आ गया और मामला बिगड़ता देख रात के लगभग ९ बजे उन्होंने संजू को महिला अस्पताल में भरती करा दिया ,अधिक खून निकलने से संजू की हालत लगातार बिगति जा रही थी वो कराह रही थी लेकिन वहा पहुचे कुछ पत्रकारों की बाछे खिल गई ,पत्रकारों ने अस्पताल के कर्मचारियो से मामले को दबाने की मोलतोल शुरू कर दिया था , इसी बिच एक लोकल चैंनल का रिपोर्टर वहा पहुच कर अपना कैमरा निकला ही था की मोलभाव में लगे दुसरे पत्रकार ने उसे धमकी देते हुए कहा की अगर ये ख़बर चल गए तो समझ लेना , अचानक सूचना मिलाती है की संजू की मौत हो गई , थोडी ही देर में कई पत्रकार पहुच गए मगर आधी रात के समय पत्रकारिता का पवित्र पेशा रंडी (इस शब्द के लिये क्षमा करे ) के पेशे से बदतर दिखा जब पत्रकार दो खेमे में देखे , एक वे थे जो फटाफट अपने डेस्क पे ख़बर नोट करा और ब्रेक कर रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो लाश का सौदा कर रहे थे ये लोग गर्भपात करने वालो को कानून बता कर भयभीत कर रहे थे ,जैसे उन्हे मालूम था की भय जितना बढेगा ख़बर न छपने की कीमत भी उतनी बढेगी ,इतना ही नही लाश के इन सौदागरों ने भय और बढ़ने के लिये मृतक के पति राजकुमार जो की रिक्शा चालक था से कहलवाकर रिक्शा संघ के लोगो को अस्पताल बुलकर हंगामा शुरू करा दिया , हंगामा सुनकर पुलिस भी आ गई कुछ पत्रकार अपनी ख़बर कर वापस लौट गए थे लेकिन पत्रकारिता को कोठे तक पहुचाने का कसम खाए कुछ पत्रकार अभी वही थे। अचानक हंगामा बंद हो गया ,पुलिसवाले वापस लौट गए संजू का पति जो अबतक अपनी पत्नी के मौत के लिये अस्पताल के कर्मचारियो को दोषी ठहरा रहा था ,अब इसे अपनी बदकिस्मती बताने लगा । इतना ही नही उसे आनन फानन वे अस्पताल से विदा कर दिया गया ,और अब वो कहा है किसी को नही मालूम ।
बताने की जरुरत नही है ऐसा क्यो हुआ होगा , रही सही शक सुबह के अख़बार ने यकीं में बदल दिया
प्रदेश के सबसे बड़े अख़बार का दावा करने वाले अख़बार में संजू नदारद थी
एक अन्य बड़े ब्रांड ने ख़बर को बड़े ही हलके और अनमने तरीके से लिख कर खानापूर्ति कर ली जबकि एक अख़बार ने संजू की मौत संदिग्ध अवस्था में बताया
सुबह १० बजे प्रेस क्लब पे जब पत्रकार इकठ्ठा हुए तो वह सिर्फ़ एक ही चर्चा हुई , कौन कितना पाया ,इस बात की चर्चा कोई नही कर रहा था की कन्या भ्रूण हत्या करने वाले ,सरकारी अस्पताल में अवैध गर्भपात कराने वाले ,एक महिला की जान लेने वालो के खिलाफ कुछ किया जाए ,क्योकि पत्रकारिता लाकतंत्र का चौथा स्तम्भ है , उसका फ़र्ज़ है लोकतंत्र की जनता की हिफाजत करना ,
संजू तो मर गई मगर उसकी मौत ने पत्रकारिता पे कई सवाल खड़े कर देये है जिनका जवाब हमें खोजना है ताकि हम इस पेशे की नई परिभाषा बना सके जिसमे सबकुछ हो मगर पवित्रता आदर्श त्याग जूनून निडरता जैसे शब्द न हो क्योकि जो पत्रकारिता मंगल के अँधेरी रात में देखने को मिली उसमे उपरोक्त शब्द अपना अपमान करा रहे है बेहतर तो यही हो की ये शब्द अपनी पहचान कही और बनाने की कोशिश करे , और पत्रकारिता को वो सबकुछ करने दे जो आज के ये लम्पट करना चाहते है । साथ ही अब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्भा नही बल्कि लोकतंत्र का स्वयम्भू गुंडा कहना चहिये ।